CBSE Class 11 · Hindi 1st Language · आरोह भाग 1
विदाई-संभाषण
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Shiromani Narayan
Summary
जो लिखना था] वह लिखा गया। अब खुलासा बात यह है कि एक बार ^शो* और ^ड्यूटी* का मुकाबिला कीजिए। (शिवशंभु के चि_े) बालमुवुंफद गुप्त (हरियाणा) प्रमुख संपादनः अखबार-ए-चुनार] हिंदुस्तान] हिंदी बंगवासी] भारतमिता आदि खत] खेल तमाशा म्ऋयु ः सन्१९०७ गुप्त जी की आरंभिक शिक्षा उदू़ में हुई। बाद में उन्होंने हिंदी सीखी। विधिावत्शिक्षा मिडिल तक प्राप्त की] मगर स्वाधयाय से काप़्ाफी ज्ञान अजि़त किया। वे खड़ी बोली और आद्ुनिक हिंदी साहिऋय काे स्थापित करने वाले लेखकाें में से एक थे। उन्हें भारतेंदु-युग औरि}वेदी-युग के बीच की कड़ी के :प में देखा जाता है। बालमुवंुफद गुप्त राष्ट्रीय नवजागरण के सव्रिफय पताकार थे। उस दौर के अन्य पताकारों की तरह वे साहिऋय-स्जन में भी सव्रिफय रहे। पताकारिता उनके लिए स्वाधाीनता-संग्राम का हथियार थी। यही कारण है कि उनके लेखन में निभी़कता पूरी तरह मौजूद है। साथ ही उसमें व्यंग्य-विनोद का भी पुट दिखाई पड़ता है। उन्होंने बांग्ला और संस्कृत की कुछ रचनाओं के अनुवाद भी किए।
Section 1 of 'विदाई-संभाषण' by Shiromani Narayan. Read the Hindi passage; use Words tab for hard words.
वे शब्दों के अद्भुत पारखी थे। अनस्थिरता शब्द की शुद्धता काे लेकर उन्होंने महावीर प्रसादि}वेदी से लंबी बहस की। इस तरह के अन्य अनेक शब्दों पर उन्होंने बहस चलाई। विदाई-संभाषाणद्४५ विदाई-संभाषाण उनकी सवा़धिाक च£चत व्यंग्य कृति ^शिवशंभु के चि_े* का एक अंश है। यह पाठ वायसराय कज़न (जो १८९९-१९०४ एवं १९०४-१९०५ तक दो बार वायसराय रहे) के शासन में भारतीयों की स्थिति का खुलासा करता है। कहने काे उनके शासन काल में विकास के बहुत सारे काय़ हुए] नए-नए आयोग बनाए गए] किंतु उन सबका उखेश्य शासन में गोरों का वच़स्व स्थापित करना एवं साथ ही इस देश के संसाद्नों का अंग्रेजों के हित में सवा़ेटाम उपयोग करना था। हर स्तर पर कज़न ने अंग्रेजों का वच़स्व स्थापित करने की काेशिश की। वे सरकारी निरंकुशता के पक्षधार थे। लिहाजा प्रेस की स्वतंताता तक पर उन्होंने प्रतिबंद्लगा दिया। अंतिः काैंसिल में मनपसंद अंग्रेज सदस्य नियुक्त करवाने के मुखे पर उन्हें देश-विदेश दोनों जगहों पर नीचा देखना पड़ा।
Section 2 of 'विदाई-संभाषण' by Shiromani Narayan. Read the Hindi passage; use Words tab for hard words.
क्षुब्द्होकर उन्होंने इस्तीप़्ाफा दे दिया और वापस इंग्लैंड चले गए। पाठ में भारतीयों की बेबसी] दुख एवं लाचारी काे व्यंग्याऋमक ढंग से लाॉड़ कज़न की लाचारी से जोड़ने की काेशिश की गई है। साथ ही यह दिखाने की काेशिश की गई है कि शासन के आततायी :प से हर किसी काे कष्ट होता है चाहे वह सामान्य जनता हो या फिर लाॉड़ कज़न जैसा वायसराय। यह उस समय लिखा गया ग| का नमूना है] जब प्रेस पर पाबंदी का दौर चल रहा था। ऐसी स्थिति में विनोदप्रियता] चुलबुलापन] संजीदगी] नवीन भाषा-प्रयोग एवं रवानगी के साथ ही यह एक साहसिक ग| का भी नमूना है। विदाई-संभाषाण माइ लाॉड़! अंत काे आपके शासन-काल का इस देश में अंत हो गया। अब आप इस देश से अलग होते हैं। इस संसार में सब बातों का अंत है। इससे आपके शासन-काल का भी अंत होता] चाहे आपकी एक बार की कल्पना के अनुसार आप यहाँ के चिरस्थाई वाइसराय भी हो जाते। किंतु इतनी जल्दी वह समय पूरा हो जाएगा] ऐसा विचार न आप ही का था] न इस देश के निवासियों का।
Section 3 of 'विदाई-संभाषण' by Shiromani Narayan. Read the Hindi passage; use Words tab for hard words.
इससे जान पड़ता है कि आपके और यहाँ के निवासियों के बीच में काेई तीसरी शक्ति और भी है] जिस पर यहाँ वालों का तो क्या] आपका भी काबू नहीं है। बिछड़न-समय बड़ा क#णोऋपादक होता है। आपकाे बिछड़ते देखकर आज त्रदय में बड़ा दुख है। माइ लाॉड़! आपके दूसरी बार इस देश में आने से भारतवासी किसी प्रकार प्रसन्न न थे। वे यही चाहते थे कि आप फिर न आवें। पर आप आए और उससे यहाँ के लोग बहुत ही दुखित हुए। वे दिन-रात यही मनाते थे कि जल्द श्रीमान्यहाँ से पधारें। पर अहो! आज आपके जाने पर हषा़ की जगह विषाद होता है। इसी से जाना कि बिछड़न-समय बड़ा क#णोऋपादक होता है] बड़ा पविता] बड़ा निम़ल और बड़ा काेमल होता है। वैर-भाव छूटकर शांत रस का आविभा़व उस समय होता है। हुआ। इससे नहीं जानता कि वहाँ बिछड़ने के समय लोगों का क्या भाव होता है। पर इस देश के पशु-पक्षियों काे भी बिछड़ने के समय उदास देखा है। एक बार शिवशंभु के दो गायें थीं। उनमें एक अधिाक बलवाली थी।
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वह कभी-कभी अपने सींगों की विदाई-संभाषाणद्४७ टक्कर से दूसरी कमजोर गाय काे गिरा देती थी। एक दिन वह टक्कर मारने वाली गाय पुरोहित काे दे दी गई। देखा कि दुब़ल गाय उसके चले जाने से प्रसन्न नहीं हुई] वरंच उस दिन वह भूखी खड़ी रही] चारा छुआ तक नहीं। माइ लाॉड़! जिस देश के पशुओं के बिछड़ते समय यह दशा होती है] वहाँ मनुष्यों की वैफसी दशा हो सकती है] इसका अंदाज लगाना कठिन नहीं है। आगे भी इस देश में जो प्रधान शासक आए] अंत में उनकाे जाना पड़ा। इससे आपका जाना भी परंपरा की चाल से कुछ अलग नहीं है] तथापि आपके शासन-काल का नाटक घोर दुखांत है] और अधिाक आश्चय़ की बात यह है कि दश़क तो क्या] स्वयं सूताधार भी नहीं जानता था कि उसने जो खेल सुखांत समझकर खेलना आंरभ किया था] वह दुखांत हो जावेगा। जिसके आदि में सुख था] मधय में सीमा से बाहर सुख था] उसका अंत ऐसे घोर दुख के साथ वैफसे हुआ\ आह! घमंडी खिलाड़ी समझता है कि दूसरों काे अपनी लीला दिखाता हूँ। किंतु परदे के पीछे एक और ही लीलामय की लीला हो रही है] यह उसे खबर नहीं!
Section 5 of 'विदाई-संभाषण' by Shiromani Narayan. Read the Hindi passage; use Words tab for hard words.
इस बार बंबई* में उतरकर माइ लाॉड़! आपने जो इरादे जाहिर किए थे] जरा देखिए तो उनमें से काैन-काैन पूरे हुए\ आपने कहा था कि यहाँ से जाते समय भारतवषा़ काे ऐसा कर जाऊँगा कि मेरे बाद आने वाले बडे़ लाटों काे वषाोएं तक कुछ करना न पड़ेगा] वे कितने ही वषाोएं सुख की नींद सोेते रहेंगे। किंतु बात उलटी हुई। आपकाे स्वयं इस बार बेचैनी उठानी पड़ी है और इस देश में जैसी अशांति आप पैफला चले हैं] उसके मिटाने में आपके पद पर आने वालों काे न जाने कब तक नींद और भूख हराम करना पड़ेगा। इस बार आपने अपना बिस्तरा गरम राख पर रखा है और भारतवासियों काे गरम तवे पर पानी की बूँदों की भाँति नचाया है। आप स्वयं भी खुश न हो सके और यहाँ की प्रजा काे सुखी न होने दिया] इसका लोगों के चिटा पर बड़ा ही दुख है। * वत़मान में मंुबई विचारिए तो] क्या शान आपकी इस देश में थी और अब क्या हो गई! कितने ऊँचे होकर आप कितने नीचे गिरे!
Section 6 of 'विदाई-संभाषण' by Shiromani Narayan. Read the Hindi passage; use Words tab for hard words.
अलिप़्ाफ लैला के अलहदीन ने चिराग रगड़कर और अबुलहसन ने बगदाद के खलीप़्ाफा की गखी पर आँख खोलकर वह शान न देखी] जो दिल्ली-दरबार में आपने देखी। आपकी और आपकी लेडी की कुसी़ सोने की थी और आपके प्रभु महाराज के छोटे भाई और उनकी पऋनी की चाँदी की। आप दाहिने थे] वह बाएँ] आप प्रथम थे] वह दूसरे। इस देश के सब रईसों ने आपकाे सलाम पहले किया और बादशाह के भाई काे पीछे। जुलूस में आपका हाथी सबसे आगे और सबसे ऊँचा था_ हौदा] चँवर] छता आदि सबसे बढ़-चढ़कर थे। सारांश यह है कि ईश्वर और महाराज एडवड़ के बाद इस देश में आप ही का एक दजा़ था। किंतु अब देखते हैं कि जंगी लाट के मुकाबले में आपने पटखनी खाई] सिर के बल नीचे आ रहे! आपके स्वदेश में वही ऊँचे माने गए] आपकाे साप़्ाफ नीचा देखना पड़ा! पद-ऋयाग की धामकी से भी ऊँचे न हो सके। आप बहुत धाीर-गंभीर प्रसिद्ध थे। उस सारी धाीरता-गंभीरता का आपने इस बार काैंसिल में बेकानूनी कानून पास करते और कनावोकेशन वक्त्ता देते समय दिवाला निकाल दिया। यह दिवाला तो इस देश में हुआ।
Section 7 of 'विदाई-संभाषण' by Shiromani Narayan. Read the Hindi passage; use Words tab for hard words.
उधार विलायत में आपके बार-बार इस्तीप़्ाफा देने की धामकी ने प्रकाश कर दिया कि जड़ हिल गई है। अंत में वहाँ भी आपकाे दिवालिया होना पड़ा और धाीरता-गंभीरता के साथ द्ढ़ता काे भी तिलांजलि देनी पड़ी। इस देश के हाकिम आपकी ताल पर नाचते थे] राजा-महाराजा डोरी हिलाने से सामने हाथ बाँधो हाजिर होते थे। आपके एक इशारे में प्रलय होती थी। कितने ही राजों काे म^ी के खिलौने की भाँति आपने तोड़-फोड़ डाला। कितने ही म^ी-काठ के खिलौने आपकी कृपा के जादू से बडे़-बडे़ पदाधिाकारी बन गए। आपके इस इशारे में इस देश की शिक्षा पायमाल हो गई] स्वाधाीनता उड़ गई। बंग देश के सिर पर आरह रखा गया। आह] इतने बडे़ माइ लाॉड़ का यह दजा़ हुआ कि फौजी अप़्ाफसर उनके इच्छित पद पर नियत न हो सका और उनकाे उसी गुस्से के मारे इस्तीप़्ाफा दाखिल करना पड़ा] वह भी मंजूर हो गया। उनका रखाया एक आदमी नौकर न रखा] उलटा उन्हीं काे निकल जाने का हुक्म मिला!
Section 8 of 'विदाई-संभाषण' by Shiromani Narayan. Read the Hindi passage; use Words tab for hard words.
विदाई-संभाषाणद्४९ जिस प्रकार आपका बहुत ऊँचे चढ़कर गिरना यहाँ के निवासियों काे दुखित कर रहा है] गिरकर पड़ा रहना उससे भी अधिाक दुखित करता है। आपका पद छूट गया तथापि आपका पीछा नहीं छूटा है। एक अदना क्लव़फ जिसे नौकरी छोड़ने के लिए एक महीने का नोटिस मिल गया हो नोटिस की अवधिा काे बड़ी घ्णा से काटता है। आपकाे इस समय अपने पद पर रहना कहाँ तक पसंद है यह आप ही जानते होंगे। अपनी दशा पर आपकाे वैफसी घ्णा आती है] इस बात के जान लेने का इन देशवासियों काे अवसर नहीं मिला] पर पतन के पीछे इतनी उलझन में पड़ते उन्होंने किसी काे नहीं देखा। माइ लाॉड़] एक बार अपने कामों की ओर धयान दीजिए। आप किस काम काे आए थे और क्या कर चले। शासक-प्रजा के प्रति कुछ तो कत़व्य होता है] यह बात आप निश्चित मानते होंगे। सो कृपा करके बतलाइए] क्या कत़व्य आप इस देश की प्रजा के साथ पालन कर चले!
Section 9 of 'विदाई-संभाषण' by Shiromani Narayan. Read the Hindi passage; use Words tab for hard words.
क्या आँख बंद करके मनमाने हुक्म चलाना और किसी की कुछ न सुनने का नाम ही शासन है\ क्या प्रजा की बात पर कभी कान न देना और उसकाे दबाकर उसकी मजाी़ के वि#द्ध जिख से सब काम किए चले जाना ही शासन कहलाता है\ एक काम तो ऐसा बतलाइए] जिसमें आपने जिख छोड़कर प्रजा की बात पर धयान दिया हो। वैफसर१ और जार२ भी घेरने-घोटने से प्रजा की बात सुन लेते हैं पर आप एक मौका तो बताइए] जिसमें किसी अनुरोधा या प्राथ़ना सुनने के लिए प्रजा के लोगों काे आपने अपने निकट फटकने दिया हो और उनकी बात सुनी हो। नादिरशाह३ ने जब दिल्ली में कऋलेआम किया तो आसिप़्ाफजाह के तलवार १- वैफसर - रोमन तानाशाह जूलियस सीजर के नाम से बना शब्द जो तानाशाह जम़न शासकाें (९६२ से १८७६ तक) के लिए प्रयोग होता था। २- जार - यह भी जूलियस सीजर से बना शब्द है जो विशेषा :प से :स के तानाशाह शासकाें (१६वीं सदी से १९१७ तक) के लिए प्रयुक्त होता था। इस शब्द का पहली बार बुल्गेरियाई शासक (९१३ में) के लिए प्रयोग हुआ था।
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३- नादिरशाह- (१६८८-१७४७) १७३६ से १७४७ तक ईरान के शाह रहे। अपने तानाशाही स्व:प के कारण ^नेपोलियन ऑप़्ाफ परशिया* के नाम से भी जाने जाते थे। पानीपत के तीसरे युद्ध में अहमदशाह अब्दाली काे नादिरशाह ने ही आक्रमण के लिए भेजा था। गले में डालकर प्राथ़ना करने पर उसने कऋलेआम उसी दम रोक दिया। पर आठ करोड़ प्रजा के गिड़गिड़ाकर विच्छेद न करने की प्राथ़ना पर आपने जरा भी धयान नहीं दिया। इस समय आपकी शासन-अवधिा पूरी हो गई है तथापि बंग-विच्छेद किए बिना घर जाना आपकाे पसंद नहीं है! नादिर से भी बढ़कर आपकी जिख है। क्या समझते हैं कि आपकी जिख से प्रजा के जी में दुख नहीं होता\ आप विचारिए तो एक आदमी काे आपके कहने पर पद न देने से आप नौकरी छोड़े जाते हैं] इस देश की प्रजा काे भी यदि कहीं जाने की जगह होती] तो क्या वह नाराजा होकर इस देश काे छोड़ न जाती\ यहाँ की प्रजा ने आपकी जिख का फल यहीं देख लिया।
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उसने देख लिया कि आपकी जिस जिख ने इस देश की प्रजा काे पीडि़त किया] आपकाे भी उसने कम पीड़ा न दी] यहाँ तक कि आप स्वयं उसका शिकार हुए। यहाँ की प्रजा वह प्रजा है] जो अपने दुख और कष्टों की अपेक्षा परिणाम का अधिाक धयान रखती है। वह जानती है कि संसार में सब चीजों का अंत है। दुख का समय भी एक दिन निकल जावेगा] इसी से सब दुखों काे झेलकर] पराधाीनता सहकर भी वह जीती है। माइ लाॉड़! इस कृतज्ञता की भूमि की महिमा आपने कुछ न समझी और न यहाँ की दीन प्रजा की श्रद्धा-भक्ति अपने साथ ले जा सके] इसका बड़ा दुख है। इस देश के शिक्षितों काे तो देखने की आपकी आँखों काे ताब नहीं। अनपढ़-गूँगी प्रजा का नाम कभी-कभी आपके मुँह से निकल जाया करता है। उसी अनपढ़ प्रजा में नर सुलतान नाम के एक राजकुमार का गीत गाया जाता है। एक बार अपनी विपद लाड़ कज़न (भारत के वायसराय १८९९-१९०४ तथा १९०४-१९०५ तक) विदाई-संभाषाणद्५१ के कई साल सुलतान ने नरवरगढ़ नाम के एक स्थान में काटे थे। वहाँ चौकीदारी से लेकर उसे एक ऊँचे पद तक काम करना पड़ा था।
Section 12 of 'विदाई-संभाषण' by Shiromani Narayan. Read the Hindi passage; use Words tab for hard words.
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