CBSE Class 11 · Hindi 1st Language · आरोह भाग 1
गलता लोहा
Chapter summary, hard words and model exam answers for CBSE Class 11 Hindi.
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Kanhaiyalal Sethia
Summary
अंतर की घुमड़ती वेदना काे आँखों की राह बाहर निकाल लेने पर मनुष्य जो भी निश्चय करता है वे भावुक क्षणों की अपेक्षा अधिाक विवेकपूण़ होते हैं। (दाज्यू) शेखर जोशी दाज्यू] हलवाहा] नौरंगी बीमार है (कहानी-संग्रह)_ एक पेड़ की याद (शब्दचिता-संग्रह) निद्नः सन्२०२२ पिछली सदी का छठवाँ दशक हिंदी कहानी के लिए युगांतकारी समय था। एक साथ कई युवा कहानीकारों ने अब तक चली आती कहानियों के रंग-ढंग से अलग तरह की कहानियाँ लिखनी शु: कीं और देखते-देखते कहानी की विध साहिऋय-जगत के वेंफद्र में आ खड़ी हुई। उस पूरे उठान काे नाम दिया गया नई कहानी आंदोलन। इस आंदोलन के बीच उभरी हुई प्रतिभाओं में शेखर जोशी का स्थान अन्यतम है। उनकी कहानियाँ नई कहानी आंदोलन के प्रगतिशील पक्ष का प्रतिनिदि्ऋव करती हैं। समाज का मेहनतकश और सुविधहीन तबका उनकी कहानियों में जगह पाता है। निहायत सहज एवं आडंबरहीन भाषा-शैली में वे सामाजिक यथाथ़ के बारीक नुक्तों काे पकड़ते और प्रस्तुत करते हैं।
Section 1 of 'गलता लोहा' by Kanhaiyalal Sethia. Read the Hindi passage; use Words tab for hard words.
उनके रचना-संसार से गुजरते हुए समकालीन जनजीवन की बहुविद्विडंबनाओं काे महसूस किया जा सकता है। ऐसा करने में उनकी प्रगतिशील जीवन-द्ष्टि और यथाथ़ बोधा का बड़ा योगदान रहा है। शेखर जी की कहानियाँ विभिन्न भारतीय भाषाओं के अतिरिक्त अंग्रेजी] पोलिश और :सी में भी अनूदित हो चुकी हैं। उनकी प्रसिद्ध कहानी दाज्यू पर चिल्ड्रंस पि़्ाफल्म सोसाइटी }ारा पि़्ाफल्म का निमा़ण भी हुआ है। गलता लोहा शेखर जोशी की कहानी-कला का एक प्रतिनिदि्नमूना है। समाज के जातिगत विभाजन पर कई काेणों से टिप्पणी करने वाली यह कहानी इस बात का उदाहरण है कि शेखर जोशी के लेखन में अथ़ की गहराई का दिखावा और बड़बोलापन जितना ही कम है] वास्तविक अथ़-गांभीय़ उतना ही अद्कि। लेखक की किसी मुखर टिप्पणी के बगैर ही पूरे पाठ से गुजरते हुए हम यह देख पाते हैं कि एक मेधावी] किंतु निद़्न ब्रांण युवक मोहन किन परिस्थितियों के चलते उस मनोदशा तक पहुँचता है] जहाँ उसके लिए जातीय अभिमान बेमानी हो जाता है।
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सामाजिक विदि्-निष्ोधें काे ताक पर रखकर वह द्नराम लोहार के आफर पर बैठता ही नहीं] उसके काम में भी अपनी कुशलता दिखाता है। मोहन का व्यक्तिऋव जातिगत आधर पर निमि़त झूठे भाईचारे की जगह मेहनतकशों के सच्चे भाईचारे की प्रस्तावना करता प्रतीत होता है] मानो लोहा गलकर एक नया आकार ले रहा हो। गलता लोहा मोहन के पैर अनायास ही शिल्पकार टोले की ओर मुड़ गए। उसके मन के किसी काेने में शायद धानराम लोहार के आफर की वह अनुगूँज शेषा थी जिसे वह पिछले तीन-चार दिनों से दुकान की ओर जाते हुए दूर से सुनता रहा था। निहाई पर रखे लाल गम़ लोहे पर पड़ती हथौड़े की धाप्-धाप्आवाज] ठंडे लोहे पर लगती चोट से उठता ठनकता स्वर और निशाना साधाने से पहले खाली निहाई पर पड़ती हथौड़ी की खनक जिन्हें वह दूर से ही पहचान सकता था। लंबे बेंटवाले हँसुवे काे लेकर वह घर से इस उखेश्य से निकला था कि अपने खेतों के किनारे उग आई काँटेदार झाडि़यों काे काट-छाँटकर साप़्ाफ कर आएगा।
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बूढ़े पुरोहिताई के बूते पर उन्होंने घर-संसार चलाया था] वह भी अब वैसे कहाँ कर पाते हैं! यजमान लोग उनकी निष्ठा और संयम के कारण ही उनपर श्रद्धा रखते हैं लेकिन बुढ़ापे का जज़र शरीर अब उतना कठिन श्रम और व्रत-उपवास नहीं झेल पाता। सुबह-सुबह जैसे उससे सहारा पाने की नीयत से ही उन्होंने गहरा निःश्वास लेकर कहा था ^आज गणनाथ जाकर चंद्रदटा जी के लिए #द्रीपाठ करना था] अब मुश्किल ही लग रहा है। यह दो मील की सीधाी चढ़ाई अब अपने बूते की नहीं। एकाएक ना भी नहीं कहा जा सकता] कुछ समझ में नहीं आता!* मोहन उनका आशय न समझता हो ऐसी बात नहीं लेकिन पिता की तरह ऐसे अनुष्ठान कर पाने का न उसे अभ्यास ही है और न वैसी गति। पिता की बातें सुनकर भी उसने उनका भार हलका करने का काेई सुझाव नहीं दिया। जैसे हवा में बात कह दी गई थी वैसे ही अनुटारित रह गई। पिता का भार हलका करने के लिए वह खेतों की ओर चला था लेकिन हँसुवे की धार पर हाथ पेफरते हुए उसे लगा वह पूरी तरह वुंफद हो चुकी है।
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धानराम अपने बाएँ हाथ से धाौंकनी फूँकता हुआ दाएँ हाथ से भêòी में गरम होते लोहे काे उलट-पलट रहा था और मोहन भ_ी से दूर हटकर एक खाली कनिस्तर के उफपर बैठा उसकी कारीगरी काे पारखी निगाहों से देख रहा था। ^मास्टर तिालोक सिंह तो अब गुजर गए होंगे]* मोहन ने पूछा। वे दोनों अब अपने बचपन की दुनिया में लौट आए थे। धानराम की आँखों में एक चमक-सी आ गई। वह बोला] ^मास्साब भी क्या आदमी थे लला! अभी पिछले साल ही गुजरे। सच कहूँ] आखिरी दम तक उनकी छड़ी का डर लगा ही रहता था।* दोनों हो-हो कर हँस दिए। कुछ क्षणों के लिए वे दोनों ही जैसे किसी बीती हुई दुनिया में लौट गए। …गोपाल सिंह की दुकान से हुक्के का आखिरी कश खींचकर तिालोक सिंह स्कूल की चहारदीवारी में उतरते हैं। थोड़ी देर पहले तक धामाचौकड़ी मचाते] उठा-पटक करते और बांज के पेड़ों की टहनियों पर झूलते बच्चों काे जैसे साँप सूँघ गया है।
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कड़े स्वर में वह पूछते हैं] ^प्राथ़ना कर ली तुम लोगों ने\* यह जानते हुए भी कि यदि प्राथ़ना हो गई होती तो गोपाल सिंह की दुकान तक उनका समवेत स्वर पहुँचता ही] तिालोक सिंह घूर-घूरकर एक-एक लड़के काे देखते हैं। फिर वही कड़कदार आवाज] ^मोहन नहीं आया आज\* मोहन उनका चहेता शिष्य था। पुरोहित खानदान का कुशाग्र बुद्धि का बालकु पढ़ने में ही नहीं] गायन में भी बेजोड़। तिालोक सिंह मास्टर ने उसे पूरे स्कूल का माॉनीटर बना रखा था। वही सुबह-सुबह] ^हे प्रभो आनंददाता! ज्ञान हमकाे दीजिए।* का पहला स्वर उठाकर प्राथ़ना शु: करता था। मोहन काे लेकर मास्टर तिालोक सिंह काे बड़ी उम्मीदें थीं। कक्षा में किसी छाता काे काेई सवाल न आने पर वही सवाल वे मोहन से पूछते और उनका अनुमान सही निकलता। मोहन ठीक-ठीक उटार देकर उन्हें संतुष्ट कर देता और तब वे उस फिसंी बालक काे दंड देने का भार मोहन पर डाल देते। ^पकड़ इसका कान] और लगवा इससे दस उठक-बैठक]* वे आदेश दे देते।
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धानराम भी उन अनेक छाताों में से एक था जिसने तिालोक सिंह मास्टर के आदेश पर अपने हमजोली मोहन के हाथों कई बार बेंत खाए थे या कान खि्ंाचवाए थे। मोहन के प्रति थोड़ी-बहुत ईष्या़ रहने पर भी धानराम प्रारंभ से ही उसके प्रति स्नेह और आदर का भाव रखता था। इसका एक कारण शायद यह था कि बचपन से ही मन में बैठा दी गई जातिगत हीनता के कारण धानराम ने कभी मोहन काे अपना प्रति}ं}ी नहीं समझा बल्कि वह इसे मोहन का अधिाकार ही समझता रहा था। बीच-बीच में तिालोक सिंह मास्टर का यह कहना कि मोहन एक दिन बहुत बड़ा आदमी बनकर स्कूल का और उनका नाम ऊँचा करेगा] धानराम के लिए किसी और तरह से सोचने की गुंजाइश ही नहीं रखता था। और धानराम! वह गाँव के दूसरे खेतिहर या मजदूर परिवाराें के लड़काें की तरह किसी प्रकार तीसरे दजे़ तक ही स्कूल का मुँह देख पाया था। तिालोक सिंह मास्टर कभी-कभार ही उस पर विशेषा धयान देते थे। एक दिन अचानक ही उन्होंने पूछ लिया था] ^धानुवाँ!
Section 7 of 'गलता लोहा' by Kanhaiyalal Sethia. Read the Hindi passage; use Words tab for hard words.
तेरह का पहाड़ा सुना तो!* बारह तक का पहाड़ा तो उसने किसी तरह याद कर लिया था लेकिन तेरह का ही पहाड़ा उसके लिए पहाड़ हो गया था। ^तेरै एकम तेरै तेरै दूणी चौबीस* सटाक्! एक संटी उसकी पिंडलियों पर मास्साब ने लगाई थी कि वह टूट गई। गुस्से में उन्होंने आदेश दिया] ^जा! नाले से एक अच्छी मजबूत संटी तोड़कर ला] फिर तुझे तेरह का पहाड़ा याद कराता हूँ।* तिालोक सिंह मास्टर का यह सामान्य नियम था। सजा पाने वाले काे ही अपने लिए हथियार भी जुटाना होता था_ और जाहिर है] बलि का बकरा अपने से अधिाक मास्टर के संतोषा काे धयान में रखकर टहनी का चुनाव ऐसे करता जैसे वह अपने लिए नहीं बल्कि किसी दूसरे काे दंडित करने के लिए हथियार का चुनाव कर रहा हो। धानराम की मंदबुद्धि रही हो या मन में बैठा हुआ डर कि पूरे दिन घोटा लगाने पर भी उसे तेरह का पहाड़ा याद नहीं हो पाया था। छु^ी के समय जब मास्साब ने उससे दुबारा पहाड़ा सुनाने काे कहा तो तीसरी सीढ़ी तक पहुँचते-पहुँचते वह फिर लड़खड़ा गया था।
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लेकिन इस बार मास्टर तिालोक सिंह ने उसके लाए हुए बेंत का उपयोग करने की बजाय जबान की चाबुक लगा दी थी] ^तेरे दिमाग में तो लोहा भरा है रे! वि|ा का ताप कहाँ लगेगा इसमें\* अपने थैले से पाँच-छह दराँतियाँ निकालकर उन्होंने धानराम काे धार लगा लाने के लिए पकड़ा दी थीं। किताबों की वि|ा का ताप लगाने की सामथ्य़ धानराम के पिता की नहीं थी। धानराम हाथ-पैर चलाने लायक हुआ ही था कि बाप ने उसे धाौंकनी फूँकने या सान लगाने के कामों में उलझाना शु: कर दिया और फिर धाीरे-धाीरे हथौड़े से लेकर घन चलाने की वि|ा सिखाने लगा। प़्ाफव़फ इतना ही था कि जहाँ मास्टर तिालोक सिंह उसे अपनी पसंद का बेंत चुनने की छूट दे देते थे वहाँ गंगाराम इसका चुनाव स्वयं करते थे और जरा-सी गलती होने पर छड़] बेंत] हऋथा जो भी हाथ लग जाता उसी से अपना प्रसाद दे देते। एक दिन गंगाराम अचानक चल बसे तो धानराम ने सहज भाव से उनकी विरासत सँभाल ली और पास-पड़ोस के गाँव वालों काे याद नहीं रहा वे कब गंगाराम के आफर काे धानराम का आफर कहने लगे थे।
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प्राइमरी स्कूल की सीमा लाँघते ही मोहन ने छाताव्टिा प्राप्त कर तिालोक सिंह मास्टर की भविष्यवाणी काे किसी हद तक सिद्ध कर दिया तो साधारण हैसियत वाले यजमानों की पुरोहिताई करने वाले वंशीधार तिवारी का हौसला बढ़ गया और वे भी अपने पुता काे पढ़ा-लिखाकर बड़ा आदमी बनाने का स्वप्न देखने लगे। पीढि़यों से चले आते पैत्क धांधो ने उन्हें निराश कर दिया था। दान-दक्षिणा के बूते पर वे किसी तरह परिवार का आधा पेट भर पाते थे। मोहन पढ़-लिखकर वंश का दारिद्र्य मिटा दे यह उनकी हादि़क इच्छा थी। लेकिन इच्छा होने भर से ही सब-कुछ नहीं हो जाता। आगे की पढ़ाई के लिए जो स्कूल था वह गाँव से चार मील दूर था। दो मील की चढ़ाई के अलावा बरसात के मौसम में रास्ते में पड़ने वाली नदी की समस्या अलग थी। तो भी वंशीधार ने हिम्मत नहीं हारी और लड़के का नाम स्कूल में लिखा दिया।
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बालक मोहन लंबा रास्ता तय कर स्कूल जाता और छु^ी के बाद थका-माँदा घर लौटता तो पिता पुराणों की कथाओं से वि|ाव्यसनी बालकाें का उदाहरण देकर उसे उऋसाहित करने की काेशिश करते रहते। वषा़ के दिनों में नदी पार करने की कठिनाई काे देखते हुए वंशीधार ने नदी पार के गाँव में एक यजमान के घर पर मोहन का डेरा तय कर दिया था। घर के अन्य बच्चों की तरह मोहन खा-पीकर स्कूल जाता और छुि^यों में नदी उतार पर होने पर गाँव लौट आता था। संयोग की बात] एक बार छु^ी के पहले दिन जब नदी का पानी उतार पर ही था और मोहन कुछ घसियाराें के साथ नदी पार कर घर आ रहा था तो पहाड़ी के दूसरी ओर भारी वषा़ होने के कारण अचानक नदी का पानी बढ़ गया। पहले नदी की धारा में झाड़-झंखाड़ और पात-पतेल आने शु: हुए तो अनुभवी घसियाराें ने तेजी से पानी काे काटकर आगे बढ़ने की काेशिश की लेकिन किनारे पहुँचते-न-पहुँचते मटमैले पानी का रेला उन तक आ ही पहुँचा। वे लोग किसी प्रकार सकुशल इस पार पहुँचने में सफल हो सके।
Section 11 of 'गलता लोहा' by Kanhaiyalal Sethia. Read the Hindi passage; use Words tab for hard words.
इस घटना के बाद वंशीधार घबरा गए और बच्चे के भविष्य काे लेकर चिंतित रहने लगे। बिरादरी के एक संपन्न परिवार का युवक रमेश उन दिनों लखनऊ से छुि^यों में गाँव आया हुआ था। बातों-बातों में वंशीधार ने मोहन की पढ़ाई के संबंधा में उससे अपनी चिंता प्रकट की तो उसने न केवल अपनी सहानुभूति जतलाई बल्कि उन्हंे सुझाव दिया कि वे मोहन काे उसके साथ ही लखनऊ भेज दें। घर में जहाँ चार प्राणी हैं एक और बढ़ जाने में काेई अंतर नहीं पड़ता] बल्कि बड़े शहर में रहकर वह अच्छी तरह पढ़-लिख सकेगा। वंशीधार काे जैसे रमेश के :प में साक्षात्भगवान मिल गए हों। उनकी आँखों में पानी छलछलाने लगा। भरे गले से वे केवल इतना ही कह पाए कि बिरादरी का यही सहारा होता है। छुि^याँ शेषा होने पर रमेश वापिस लौटा तो माँ-बाप और अपनी गाँव की दुनिया से बिछुड़कर सहमा-सहमा-सा मोहन भी उसके साथ लखनऊ आ पहुँचा। अब मोहन की जिंदगी का एक नया अधयाय शु: हुआ।
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