CBSE Class 11 · Hindi 1st Language · आरोह भाग 1
मियाँ नसीरुद्दीन
Chapter summary, hard words and model exam answers for CBSE Class 11 Hindi.
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Krishna Chandra
Summary
समय ही वह रंग है जो अनेक-अनेक रंगों में विभाजित होता है और पठन-पाठन प्रक्रिया }ारा फिर एक हो जाता है (शब्दों के आलोक में) कृष्णा सोबती पंजाब- वत़मान में पाकिस्तान) ऐ लड़की] समय सरगम (उपन्यास)_ डार से बिछुड़ी] मिताो मरजानी] बादलों के घेरे] सूरजमुखी अँद्ेरे के] (कहानी संग्रह)_ हम-हशमत] शब्दों के आलोक में (शब्दचिता] संस्मरण) की महटार सदस्यता सहित अनेक राष्ट्रीय पुरस्कार। म्ऋयुः २५ जनवरी सन्२०१९ हिंदी कथा साहिऋय में कृष्णा सोबती की विशिष्ट पहचान है। वे मानती हैं कि कम लिखना विशिष्ट लिखना है। यही कारण है कि उनके संयमित लेखन और साप़्ाफ-सुथरी रचनाऋमकता ने अपना एक नित नया पाठक वग़ बनाया है। उनके कई उपन्यासों] लंबी कहानियों और संस्मरणों ने हिंदी के साहिऋयक संसार में अपनी दीघ़जीवी उपस्थिति सुनिश्चित की है। उन्होंने हिंदी साहिऋय काे कई ऐसे यादगार चरिता दिए हैं] जिन्हें अमर कहा जा सकता है_ जैसे मिताो] शाहनी] हशमत आदि।
Section 1 of 'मियाँ नसीरुद्दीन' by Krishna Chandra. Read the Hindi passage; use Words tab for hard words.
भारत पाकिस्तान पर जिन लेखकाें ने हिंदी में कालजयी रचनाएँ लिखीं] उनमें व्फष्णा सोबती का नाम पहली कतार में रखा जाएगा। बल्कि यह कहना उचित होगा कि यशपाल के झूठा-सच] राही मासूम रजा के आध गाँव और भीष्म साहनी के तमस के साथ-साथ व्फष्णा सोबती का जिंदगीनामा इस प्रंसग में एक विशिष्ट उपलब्दि्है। मियाँ नसी#खीनद्२१ संस्मरण के क्षेता में हम-हशमत शीषा़क से उनकी व्फति का विशिष्ट स्थान है] जिसमें अपने ही एक दूसरे व्यक्तिऋव के :प में उन्होंने हशमत नामक चरिता का स्जन कर एक अद्भुत प्रयोग का उदाहरण प्रस्तुत किया है। व्फष्णा जी के भाषिाक प्रयोग में भी विविद्ता है। उन्होंने हिंदी की कथा-भाषा काे एक विलक्षण ताजगी दी है। संस्व्फतनिष्ठ तऋसमता] उदू़ का बाँकपन] पंजाबी की जिंदादिली] ये सब एक साथ उनकी रचनाओं में मौजूद हैं। मियाँ नसी#खीन शब्दचिता हम-हशमत नामक संग्रह से लिया गया है। इसमें खानदानी नानबाई मियाँ नसी#खीन के व्यक्तिऋव] #चियों और स्वभाव का शब्दचिता खींचा गया है।
Section 2 of 'मियाँ नसीरुद्दीन' by Krishna Chandra. Read the Hindi passage; use Words tab for hard words.
मियाँ नसी#खीन अपने मसीहाई अंदाज से रोटी पकाने की कला और उसमें अपने खानदानी महारत काे बताते हैं। वे ऐसे इनसान का भी प्रतिनिदि्ऋव करते हैं जो अपने पेशे काे कला का दजा़ देते हैं और करके सीखने काे असली हुनर मानते हैं। मियाँ नसी#खीन साहबों] उस दिन अपन मटियामहल की तरप़्ाफ से न गुजर जाते तो राजनीति] साहिऋय और कला के हजाराें-हजार मसीहों के धाूम-धाड़क्के में नानबाइयों के मसीहा मियाँ नसी#खीन काे वैफसे तो पहचानते और वैफसे उठाते लुऋप़्ाफ उनके मसीही अंदाज का! हुआ यह कि हम एक दुपहरी जामा मस्जिद के आड़े पड़े मटियामहल के गढै़या मुहल्ले की ओर निकल गए। एक निहायत मामूली अँधोरी-सी दुकान पर पटापट आटे का ढेर सनते देख ठिठके। सोचा] सेवइयों की तैयारी होगी] पर पूछने पर मालूम हुआ खानदानी नानबाई मियाँ नसी#खीन की दुकान पर खड़े हैं। मियाँ मशहूर हैं छप्पन विाफस्म की रोटियाँ बनाने के लिए। हमने जो अंदर झाँका तो पाया] मियाँ चारपाई पर बैठे बीड़ी का मजा ले रहे हैं।
Section 3 of 'मियाँ नसीरुद्दीन' by Krishna Chandra. Read the Hindi passage; use Words tab for hard words.
मौसमों की मार से पका चेहरा] आँखों में काइयाँ भोलापन और पेशानी पर मँजे हुए कारीगर के तेवर। हमें गाहक समझ मियाँ ने नजर उठाई ^प़्ाफरमाइए।* झिझक से कहा ^आपसे कुछ एक सवाल पूछने थे आपकाे वक्त हो तो…* मियाँ नसी#खीन ने पंचहजारी अंदाज से सिर हिलाया ^निकाल लेंगे वक्त थोड़ा] पर यह तो कहिए] आपकाे पूछना क्या है\* फिर घूरकर देखा और जोड़ा ^मियाँ] कहीं अखबारनवीस तो नहीं हो\ यह तो खोजियों की खुराप़् फात है। हम तो अखबार बनानेवाले और अखबार पढ़नेवाले दोनांे मियाँ नसी#खीनद्२३ काे ही निठल्ला समझते हैं। हाँ कामकाजी आदमी काे इससे क्या काम है। खैर] आपने यहाँ तक आने की तकलीप़्ाफ उठाई ही है तो पूछिए क्या पूछना चाहते हैं!* ^पूछना यह था कि विाफस्म-विाफस्म की रोटी पकाने का इल्म आपने कहाँ से हासिल किया\* मियाँ नसी#खीन ने आँखों के कंचे हम पर पेफर दिए।
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फिर तरेरकर बोले ^क्या मतलब\ पूछिए साहब नानबाई इल्म लेने कहीं और जाएगा\ क्या नगीनासाज के पास\ क्या आईनासाज के पास\ क्या मीनासाज के पास\ या रप़्ाूफगर] रँगरेज या तेली-तंबोली से सीखने जाएगा\ क्या प़्ाफरमा दिया साहब यह तो हमारा खानदानी पेशा ठहरा। हाँ] इल्म की बात पूछिए तो जो कुछ भी सीखा] अपने वालिद उस्ताद से ही। मतलब यह कि हम घर से न निकले कि काेई पेशा अख्तियार करेंगे। जो बाप-दादा का हुनर था वही उनसे पाया और वालिद मरहूम के उठ जाने पर आ बैठे उन्हीं के ठीये पर!* ^आपके वालिद…\* मियाँ नसी#खीन की आँखें लमहा-भर काे किसी भêòी में गुम हो गएं। लगा गहरी सोच में हैं फिर सिर हिलाया ^क्या आँखों के आगे चेहरा जिंदा हो गया! हाँ हमारे वालिद साहिब मशहूर थे मियाँ बरवाफत शाही नानबाई गढ़ैयावाले के नाम से और उनके वालिद यानी कि हमारे दादा साहिब थे आला नानबाई मियाँ कल्लन।* ^आपकाे इन दोनों में से किसी किसी की भी काेई नसीहत याद हो!* ^नसीहत काहे की मियाँ! काम करने से आता है] नसीहतों से नहीं।
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हाँ!* ^बजा प़्ाफरमाया है] पर यह तो बताइए ही बताइए कि जब आप (हमने भêòी की ओर इशारा किया) इस काम पर लगे तो वालिद साहिब ने सीख के तौर पर कुछ तो कहा होगा।* नसी#खीन साहिब ने जल्दी-जल्दी दो-तीन कश खींचे] फिर गला साप़्ाफ किया और बड़े अंदाज से बोले ^अगर आपकाे कुछ कहलवाना ही है तो बताए दिए देते हैं। आप जानो जब बच्चा उस्ताद के यहाँ पढ़ने बैठता है तो उस्ताद कहता है कह] ^अलिप़्ाफ* बच्चा कहता है] ^अलिप़् कह] ^बे* बच्चा कहता है] ^बे* कह] ^जीम* बच्चा कहता है] ^जीम* इस बीच उस्ताद जोर का एक हाथ सिर पर धारता है और शागिद़ चुपचाप परवान करता है! समझे साहिब] एक तो पढ़ाई ऐसी और दूसरी…। बात बीच में छोड़ सामने से गुजरते मीर साहिब काे आवाज दे डाली ^कहो भाई मीर साहिब! सुबह न आना हुआ] पर क्यों\* मियाँ नसी#खीनद्२५ मीर साहिब ने सिर हिलाया ^मियाँ] अभी लौट के आते हैं तो बतावेंगे।* ^आप दूसरी पढ़ाई की बाबत कुछ कह रहे थे न!* इस बार मियाँ नसी#खीन ने यूँ सिर हिलाया कि सुकरात हांे ^हाँ] एक दूसरी पढ़ाई भी होती है।
Section 6 of 'मियाँ नसीरुद्दीन' by Krishna Chandra. Read the Hindi passage; use Words tab for hard words.
सुनिए] अगर बच्चे काे भेजा मदरसे तो बच्चा न कच्ची में बैठा] न बैठा वह पक्की में न दूसरी में और जा बैठा तीसरी में हम यह पूछेंगे कि उन तीन जमातों का क्या हुआ\ क्या हुआ उन तीन किलासों का\* अपना खयाल था कि मियाँ नसी#खीन नानबाई अपनी बात का निचोड़ भी निकालेंगे पर वह हमीं पर दागते रहे ^आप ही बताइए उन दो-तीन जमातों का हुआ क्या\* ^यह बात मेरी समझ के तो बाहर है।* इस बार शाही नानबाई मियाँ कल्लन के पोते अपने बचे-खुचे दाँतों से खिलखिला के हँस दिए! ^मतलब मेरा क्या साप़्ाफ न था! लो साहिबो] अभी साप़्ाफ हुआ जाता है। जरा-सी देर काे मान लीजिए हम बत़न धाोना न सीखते हम भêòी बनाना न सीखते भêòी काे आँच देना न सीखते तो क्या हम सीधो-सीधो नानबाई का हुनर सीख जाते!* मियाँ नसी#खीन हमारी ओर कुछ ऐसे देखा किए कि उन्हें हमसे जवाब पाना हो।
Section 7 of 'मियाँ नसीरुद्दीन' by Krishna Chandra. Read the Hindi passage; use Words tab for hard words.
फिर बड़े ही मँजे अंदाज में कहा ^कहने का मतलब साहिब यह कि तालीम की तालीम भी बड़ी चीज होती है।* सिर हिलाया ^है साहिब] माना!* मियाँ नसी#खीन जोश में आ गए ^हमने न लगाया होता खोमचा तो आज क्या यहाँ बैठे होते!* मियाँ काे खोमचेवाले दिनों में भटकते देख हमने बात का #ख मोड़ा ^आपने खानदानी नानबाई होने का जिक्र किया] क्या यहाँ और भी नानबाई हैं\* मियाँ ने घूरा ^बहुतेरे] पर खानदानी नहीं सुनिए] दिमागा में चक्कर काट गई है एक बात। हमारे बुजुगोएं से बादशाह सलामत ने यूँ कहा मियाँ नानबाई] काेई नई चीज खिला सकते हो\* ^हुक्म कीजिए] जहाँपनाह!* बादशाह सलामत ने प़्ाफरमाया ^काेई ऐसी चीज बनाओ जो न आग से पके] न पानी से बने।* ^क्या उनसे बनी ऐसी चीज!* ^क्यों न बनती साहिब! बनी और बादशाह सलामत ने खूब खाई और खूब सराही।* लगा] हमारा आना कुछ रंग लाया चाहता है। बेसब्री से पूछा ^वह पकवान क्या था काेई खास ही चीज होगी।* मियाँ कुछ देर सोच में खोए रहे।
Section 8 of 'मियाँ नसीरुद्दीन' by Krishna Chandra. Read the Hindi passage; use Words tab for hard words.
सोचा पकवान पर रोशनी डालने काे है कि नसी#खीन साहिब बड़ी #खाई से बोले ^यह हम न बतावेंगे। बस] आप इटा समझ लीजिए कि एक कहावत है न कि खानदानी नानबाई कुएँ में भी रोटी पका सकता है। कहावत जब भी गढ़ी गई हो] हमारे बुजुगोएं के करतब पर ही पूरी उतरती है।* मजा लेने के लिए टोका ^कहावत यह सच्ची भी है कि …।* मियाँ ने तरेरा ^और क्या झूठी है\ आप ही बताइए] रोटी पकाने में झूठ का क्या काम! झूठ से रोटी पकेगी\ क्या पकती देखी है कभी! रोटी जनाब पकती है आँच से] समझे!* सिर हिलाना पड़ा-^ठीक प़्ाफरमाते हैं।* मियाँ नसी#खीनद्२७ इस बीच मियाँ ने किसी और काे पुकार लिया ^मियाँ रहमत] इस वक्त किधार काे! अरे वह लौंडिया न आई :माली लेने। शाम काे मँगवा लीजो।* ^मियाँ] एक बात और आपकाे बताने की जहमत उठानी पड़ेगी…।* मियाँ ने एक और बीड़ी सुलगा ली थी। सो कुछ पुफती़ पा गए थे ^पूछिए अरे बात ही तो पूछिएगा जान तो न ले लेवेंगे। उसमें भी अब क्या देर!
Section 9 of 'मियाँ नसीरुद्दीन' by Krishna Chandra. Read the Hindi passage; use Words tab for hard words.
सटार के हो चुके* फिर जैसे अपने से ही कहते हों ^वालिद मरहूम तो कूच किए अस्सी पर क्या मालूम हमें इतनी मोहलत मिले] न मिले।* इस मजमून पर हमसे कुछ कहते न बन आया तो कहा ^अभी यही जानना था कि आपके बुजुगोएं ने शाही बावची़खाने में तो काम किया ही होगा\* मियाँ ने बे#खी से टोका ^वह बात तो पहले हो चुकी न!* ^हो तो चुकी साहिब] पर जानना यह था कि दिल्ली के किस बादशाह के यहाँ आपके बुजुग़ काम किया करते थे\* ^अजी साहिब] क्यों बाल की खाल निकालने पर तुले हैं! कह दिया न कि बादशाह के यहाँ काम करते थे सो क्या काप़्ाफी नहीं\* हम खिसियानी हँसी हँसे ^है तो काप़् फी] पर जरा नाम लेते तो उसे वक्त से मिला लेते।* ^वक्त से मिला लेते खूब! पर किसे मिलाते जनाब आप वक्त से\* मियाँ हँसे जैसे हमारी खिल्ली उड़ाते हों। ^वक्त से वक्त काे किसी ने मिलाया है आज तक! खैर पूछिए किसका नाम जानना चाहते हैं\ दिल्ली के बादशाह का ही ना!
Section 10 of 'मियाँ नसीरुद्दीन' by Krishna Chandra. Read the Hindi passage; use Words tab for hard words.
उनका नाम काैन नहीं जानता जहाँपनाह बादशाह सलामत ही न!* ^काैन-से] बहादुरशाह जप़्ाफर कि …!* मियाँ ने खीजकर कहा फिर अलट-पलट के वही बात। लिख लीजिए बस यही नाम आपकाे काैन बादशाह के नाम चिêòी-#क्का भेजना है कि डाकखानेवालों के लिए सही नाम-पता ही ज:री है।* हमें बिटर-बिटर अपनी तरप़्ाफ देखते पाया तो सिर हिला अपने कारीगर से बोले-^अरे ओ बब्बन मियाँ] भêòी सुलगा दो तो काम से निबटें।* ^यह बब्बन मियाँ काैन हैं] साहिब\* मियाँ ने #खाई से जैसे फाँक ही काट दी हो ^अपने कारीगर] और काैन होंगे!* मन में आया पूछ लें आपके बेटे-बेटियाँ हैं] पर मियाँ नसी#खीन के चेहरे पर किसी दबे हुए अंधाड़ के आसार देख यह मजमून न छेड़ने का प़्ौफसला किया। इतना ही कहा ^ये कारीगर लोग आपकी शागिदी़ करते हैं\* ^खाली शागिदी़ ही नहीं साहिब] गिन के मजूरी देता हूँ। दो #पये मन आटे की मजूरी। चार #पये मन मैदे की मजूरी! हाँ!
Section 11 of 'मियाँ नसीरुद्दीन' by Krishna Chandra. Read the Hindi passage; use Words tab for hard words.
^जयादातर भêòी पर काैन-सी रोटियाँ पका करती हैं\* मियाँ काे अब तक इस मजमून में काेई दिलचस्पी बावाफी न रही थी] फिर भी हमसे छुटकारा पाने काे बोले ^बावाफरखानी-शीरमाल-ताप़्ाफतान-बेसनी-खमीरी-:माली-गाव-दीदा-गाजेबान-तुनकी * फिर तेवर चढ़ा हमें घूरकर कहा ^तुनकी पापड़ से जयादा महीन होती है] महीन। हाँ। किसी दिन खिलाएँगे] आपकाे।* एकाएक मियाँ की आँखों के आगे कुछ काैंधा गया। एक लंबी साँस भरी और किसी गुमशुदा याद काे ताजा करने काे कहा ^उतर गए वे जमाने। और गए वे वाफद्रदान जो पकाने-खाने की वाफद्र करना जानते थे!
Section 12 of 'मियाँ नसीरुद्दीन' by Krishna Chandra. Read the Hindi passage; use Words tab for hard words.
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