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CBSE Class 12 · Hindi 1st Language · आरोह भाग 2

उषा

Chapter summary, hard words and model exam answers for CBSE Class 12 Hindi.

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Shamsher Bahadur Singh

Summary

शमशेर बहादुर सिंहशमशेर बहादुर सिंहशमशेर बहादुर सिंहशमशेर बहादुर सिंहशमशेर बहादुर सिंह प्रकाशित रचनाएँ ः कुछ कविताएँ] कुछ और कविताएँ] चुका भी हूँ नहीं मैं] इतने पास अपने] बात बोलेगी] काल तुझसे होड़ है मेरी] ^उदू़-हिंदी काेश* का संपादन निधानः सन्१९९३] अहमदाबाद में तुमने ^द्रती* का प| पढ़ा है\ उसकी सहजता प्राण है। खुद काे उदू़ और हिंदी का दोआब मानने वाले शमशेर की कविता एक संधिास्थल पर खड़ी है। यह संधिा एक ओर साहिऋय] चिताकला और संगीत की है तो दूसरी ओर मूऋा़ता और अमूऋा़ता की तथा ऐंद्रिय और ऐंद्रियेतर की है। विचाराें के स्तर पर प्रगतिशील और शिल्प के स्तर पर प्रयोगधामी़ कवि शमशेर की पहचान एक बिंबधामी़ कवि के :प में है। उनकी यह बिंबधामि़ता शब्दों से रंग] रेखा] स्वर और कूची की अद्भुत कशीदाकारी का माखा रखती है। उनका चिताकार मन कलाओं के बीच कुी दूरी काे न केवल पाटता है] बल्कि भाषातीत हो जाना चाहता है। उनकी मूल चिंता माधयम का उपयोग करते हुए भी बंधान से परे जाने की है। ओ माधयम!

Section 1 of 'उषा' by Shamsher Bahadur Singh. Read the Hindi passage; use Words tab for hard words.

क्षमा करना कि मैं तुम्हारे पार जाना चाहता हूँ। कथा और शिल्प दोनों ही स्तरों पर उनकी कविता का मिजाज अलग है। उदू़ शायरी के प्रभाव से संज्ञा और विशेषाण से अधिाक बल सव़नामों] क्रियाओं] अव्यों और मुहावरों काे दिया है। उन्होंने खुद भी कुछ अच्छे शेर कहे हैं। सचेत इंद्रियों का यह कवि जब प्रेम] पीड़ा] संघषा़ और स्जन काे गूँथकर कविता का महल बनाता है तो वह ठोस तो होता ही है अनुगूँजों से भी भरा होता है। वह पाठक काे न केवल पढे़े जाने के लिए आमंतिात करती है] बल्कि सुनने और देखने काे भी। प्रयोगवादी (१९४३ से प्रारंभ) कविता शिल्प संबंद्ी बहुत से प्रयोग लेकर आई। नए बिंब] नए प्रतीक] नए उपमान कविता के उपकरण बने। यहाँ तक कि पुराने उपमानों में भी नए अथ़ की चमक भरने का प्रयास प्रयोक्ता कवियों ने किया। अपना आस-पड़ोस कविता का हिस्सा बना। प्रव्फति में होने वाला परिवत़न मानवीय जीवन-चिता बनकर अभिव्यक्त हुआ। प्रस्तुत कविता उषा सूयो़दय के ठीक पहले के पल-पल परिवति़त प्रव्फति का शब्द-चिता है।

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शमशेर ऐसे बिंबद्मी़ कवि हैं] जिन्होंने प्रव्फति की गति काे शब्दों में बाँद्ने का अद्भुत प्रयास किया है। यह कविता भी इसका उदाहरण प्रस्तुत करती है। कवि भोर के आसमान का मूकद्रष्टा नहीं है। वह भोर कुी आसमानी गति काे द्रती के जीवन भरे हलचल से जोड़ने वाला स्रष्टा भी है। इसीलिए वह सूयो़दय के साथ एक जीवंत परिवेश की कल्पना करता है जो गाँव की सुबह से जुड़ता है वहाँ सिल है] राख से लीपा हुआ चौका है और है स्लेट की कालिमा पर चाक से रंग मलते अद्श्य बच्चों के नन्हे हाथ। यह एक ऐसे दिन की शुरफआत है] जहाँ रंग है] गति है और भविष्य की उजास है और है हर कालिमा काे चीरकर आने का एहसास कराती उषा। उषा उषाउषा उषाउषा प्रात नभ था बहुत नीला शंख जैसे भोर का नभ राख से लीपा हुआ चौका (अभी गीला पड़ा है) बहुत काली सिल जरा से लाल केसर से कि जैसे द्ुल गई हो स्लेट पर या लाल खडि़या चाक मल दी हो किसी ने नील जल में या किसी की गौर झिलमिल देह जैसे हिल रही हो। और… जादू टूटता है इस उषा का अब सूयो़दय हो रहा है।

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अभ्यास अभ्यासअभ्यास अभ्यासअभ्यास कविता के साथ १- कविता के किन उपमानों काे देखकर यह कहा जा सकता है कि उषा कविता गाँव की सुबह का गतिशील शब्दचिता है\ २- भोर का नभ राख से लीपा हुआ चौका (अभी गीला पड़ा है) नयी कविता में काेष्ठक] विराम चिÉों और पंक्तियों के बीच का स्थान भी कविता काे अथ़ देता है। उपयु़क्त पंक्तियों में काेष्ठक से कविता में क्या विशेषा अथ़ पैदा हुआ है\ समझाइए। अपनी रचना * अपने परिवेश के उपमानों का प्रयोग करते हुए सूयो़दय और सूया़स्त का शब्दचिता खींचिए। आपसदारी * सूयो़दय का वण़न लगभग सभी बड़े कवियों ने किया है। प्रसाद की कविता ^बीती विभावरी जाग री* और अज्ञेय की ^बावरा अहेरी* की पंक्तियाँ आगे बाॉक्स में दी जा रही हैं। ^उषा* कविता के समानांतर इन कविताओं काे पढ़ते हुए नीचे दिए गए बिंदुओं पर तीनों कविताओं का विश्लेषाण कीजिए और यह भी बताइए कि काैन-सी कविता आपकाे जयादा अच्छी लगी और क्यों\ द्बपतबसमेवसपक उपमान द्बपतबसमेवसपक शब्दचयन द्बपतबसमेवसपक परिवेश बीती विभावरी जाग री!

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अंबर पनघट में डुबो रही तारा-घट उफषा नागरी। खग-कुल कुल-कुल-सा बोल रहा] किसलय का अंचल डोल रहा] लो यह लतिका भी भर लाई मद्ु मुकुल नवल रस गागरी। अद्रों में राग अमंद पिए] अलकाें में मलयज बंद किए तू अब तक सोई है आली आँखों में भरे विहाग री। जयशंकर प्रसाद उषा भोर का बावरा अहेरी पहले बिछाता है आलोक की लाल-लाल कनियाँ पर जब खींचता है जाल काे बाँद्लेता है सभी काे साथः छोटी-छोटी चिडि़याँ] मँझोले परेवे] बड़े-बड़े पंखी डैनों वाले डील वाले डौल के बेडौल उड़ने जहाज] कलस-तिसूल वाले मंदिर-शिखर से ले तारघर की नाटी मोटी चिपटी गोल द्ुस्सों वाली उपयोग-सुंदरी बेपनाह काया काेः गोद्ूली की द्ूल काे] मोटरों के द्ुएँ काे भी पाव़फ के किनारे पुष्पिताग्र कणि़कार की आलोक-खची तन्वि :प-रेखा काे द्ुआँ यों उगलती हैं मानो उसी माता से अहेरी काे हरा देंगी। सच्चिदानंद हीरानंद वाऋस्यायन ^अज्ञेय*

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