CBSE Class 12 · Hindi 1st Language · आरोह भाग 2
बाजार दर्शन
Chapter summary, hard words and model exam answers for CBSE Class 12 Hindi.
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Jainendra Kumar
Summary
जैनेंद्र कमारजैनेंद्र कमारजैनेंद्र कमारजैनेंद्र कमारजैनेंद्र कमार कल्याणी] जयवद्ध़न] मुक्तिबोधा (उपन्यास)_ वातायन] एक रात] दो चिडि़या] फाँसी] नीलम देश की राजकन्या] पाजेब (कहानी-संग्रह)_ प्रस्तुत प्रश्न] जड़ की बात] पूवो़दय] साहिऋय का श्रेय और प्रेय] सोच-विचार] समय और हम (विचार-प्रधान निबंधा-संग्रह) प्रमुख पुरस्कारः साहिऋय अकादेमी पुरस्कार] भारत-भारती निधानः सन्१९९० में यथाथ़ काे अंतिम सऋय के :प में ओढ़कर जो अपने काे विवश मान बैठ सकता है] वही तो असमथ़ है। पर जिसने स्वप्न के सऋय के दश़न किए वह यथाथ़ की विकटता से वैफसे निरफऋसाहित हो सकता है\ हिंदी में प्रेमचंद के बाद सबसे महटवपूण़ कथाकार के :प में प्रतिष्ठित जैनेंद्र कुमार का अवदान बहुत व्यापक और वैविधयपूण़ है। अपने उपन्यासांें और कहानियों के माधयम से उन्होंने हिंदी में एक सशक्त मनोवैज्ञानिक कथा-धारा का प्रवत़न किया।
Section 1 of 'बाजार दर्शन' by Jainendra Kumar. Read the Hindi passage; use Words tab for hard words.
परख और सुनीता के बाद १९३७ में प्रकाशित ऋयागपता ने इन्हें मनोवैज्ञानिक उपन्यासकार के :प में प्रभूत प्रतिष्ठा दिलाई। इसी तरह खेल] पाजेब] नीलम देश की राजकन्या] अपना-अपना भाग्य] तऋसत जैसी कहानियों काे भी कालजयी रचनाओं के :प में मान्यता मिली है। कथाकार होने के साथ-साथ जैनेंद्र की पहचान अऋयंत गंभीर चिंतक के :प में रही। बहुत सरल एवं अनौपचारिक-सी दिखनेवाली शैली में उन्होंने समाज] राजनीति] अथ़नीति एवं दश़न से संबंधिात गहन प्रश्नों काे सुलझाने की काेशिश की है। अपनी गांधाीवादी चिंतन-द्ष्टि का जितना सुष्ठु एवं सहज उपयोग वे जीवन-जगत से जुडे़ प्रश्नों के संदभ़ में करते हैं] वहुुु अन्यता दुल़भ है और वह इस बात का सबूत पेश करता है कि गांधाीवाद काे उन्होंने कितनी गहराई से त्रदयंगम किया है। बाजार दश़न जैनेंद्र का एक महटवपूण़ निबंधा है] जिसमें गहरी वैचारिकता और साहिऋय सुलभ लालिऋय का दुल़भ संयोग देखा जा सकता है।
Section 2 of 'बाजार दर्शन' by Jainendra Kumar. Read the Hindi passage; use Words tab for hard words.
हिंदी में उपभोक्तावाद एवं बाजारवाद पर व्यापक चचा़ पिछले एक-डेढ़ दशक पहले ही शु: हुई है] पर कई दशक पहले लिखा गया जैनेंद्र का लेख आज भी इनकी मूल अंतव़स्तु काे समझाने के मामले में बेजोड़ है। वे अपने परिचितों] मिताों से जुड़े अनुभव बताते हुए यह स्पष्ट करते हैं कि बाजार की जादुई ताकत वैफसे हमें अपना गुलाम बना लेती है। अगर हम अपनी आवश्यकताओं काे ठीक-ठीक समझकर बाजार का उपयोग करें] तो उसका लाभ उठा सकते हैं। लेकिन अगर हम ज:रत काे तय कर बाजार में जाने के बजाय उसकी चमक-दमक में पँफस गए तो वह असंतोषा] त्ष्णा और ईष्या़ से घायल कर हमें सदा के लिए बेकार बना सकता है। इस मूलभाव काे जैनेंद्र कुमार ने भाँति-भाँति से समझाने की काेशिश की है। कहीं दाश़निक अंदाज में] तो कहीं किस्सागो की तरह। इसी क्रम में केवल बाजार का पोषाण करने वाले अथ़शास्ता काे उन्होंने अनीतिशास्ता बताया है। जैनेंद्र कुमार बाजार दश़नबाजार दश़नबाजार दश़नबाजार दश़नबाजार दश़न एक बार की बात कहता हूँ।
Section 3 of 'बाजार दर्शन' by Jainendra Kumar. Read the Hindi passage; use Words tab for hard words.
मिता बाजार गए तो थे काेई एक मामूली चीज लेने पर लौटे तो एकदम बहुत-से बंडल पास थे। मैंने कहा यह क्या\ बोले यह जो साथ थीं। उनका आशय था कि यह पऋनी की महिमा है। उस महिमा का मैं कायल हूँ। आदकिाल से इस विषाय में पति से पऋनी की ही प्रमुखता प्रमाणित है। और यह व्यक्तिऋव का प्रश्न नहीं] स्ताीऋव का प्रश्न है। स्ताी माया न जोड़े] तो क्या मैं जोडँ़ू\ फिर भी सच सच है और वह यह कि इस बात में पऋनी की ओट ली जाती है। मूल में एक और तटव की महिमा सविशेषा है। वह तटव है मनीबैग] अथा़त पैसे की गरमी या एनजी़। पैसा पावर है। पर उसके सबूत में आस-पास माल-टाल न जमा हो तो क्या वह खाक पावर है! पैसे काे देखने के लिए बैंक-हिसाब देखिए] पर माल-असबाब मकान-काेठी तो अनदेखे भी दीखते हैं। पैसे की उस ^पचे़जिंग पावर* के प्रयोग में ही पावर का रस है। लेकिन नहीं। लोग संयमी भी होते हैं। वे पि़्ाफजूल सामान काे पि़्ाफजूल समझते हैं। वे पैसा बहाते नहीं हैं और बुद्धिमान होते हैं।
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बुद्धि और संयमपूव़क वह पैसे काे जोड़ते जाते हैं] जोड़ते जाते हैं। वह पैसे की पावर काे इतना निश्चय समझते हैं कि उसके प्रयोग की परीक्षा उन्हें दरकार नहीं है। बस खुद पैसे के जुड़ा होने पर उनका मन गव़ से भरा फूला रहता है। मैंने कहा यह कितना सामान ले आए! मिता ने सामने मनीबैग पैफला दिया] कहा यह देखिए। सब उड़ गया] अब जो रेल-टिकट के लिए भी बचा हो! मैंने तब तय माना कि और पैसा होता और सामान आता। वह सामान ज:रत की तरप़्ाफ देखकर नहीं आया] अपनी ^पचे़जिंग पावर* के अनुपात में आया है। लेकिन ठहरिए। इस सिलसिले में एक और भी महटव का तटव है] जिसे नहीं भूलना चाहिए। उसका भी इस करतब में बहुत-कुछ हाथ है। वह महटव है] बाजार। मैंने कहा यह इतना कुछ नाहक ले आए! ़़़़़ बाजार दश़ऩ मिता बोले कुछ न पूछो। बाजार है कि शैतान का जाल है\ ऐसा सजा-सजाकर माल रखते हैं कि बेहया ही हो जो न पँफसे। मैंने मन में कहा] ठीक। बाजार आमंतिात करता है कि आओ मुझे लूटो और लूटो। सब भूल जाओ] मुझे देखो।
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मेरा :प और किसके लिए है\ मैं तुम्हारे लिए हूँ। नहीं कुछ चाहते हो] तो भी देखने में क्या हरज है। अजी आओ भी। इस आमंताण में यह खूबी है कि आग्रह नहीं है आग्रह तिरस्कार जगाता है। लेकिन उफँचे बाजार का आमंताण मूक होता है और उससे चाह जगती है। चाह मतलब अभाव। चौक बाजार में खड़े होकर आदमी काे लगने लगता है कि उसके अपने पास काप़्ाफी नहीं है और चाहिए] और चाहिए। मेरे यहाँ कितना परिमित है और यहाँ कितना अतुलित है ओह! काेई अपने काे न जाने तो बाजार का यह चौक उसे कामना से विकल बना छोड़े। विकल क्यों] पागल। असंतोषा] त्ष्णा और ईष्या़ से घायल कर मनुष्य काे सदा के लिए यह बेकार बना डाल सकता है। एक और मिता की बात है। यह दोपहर के पहले के गए-गए बाजार से कहीं शाम काे वापिस आए। आए तो खाली हाथ! मैंने पूछा कहाँ रहे\ बोले बाजार देखते रहे। मैंने कहा बाजार काे देखते क्या रहे\ बोले क्यों\ बाजार! तब मैंने कहा लाए तो कुछ नहीं! बोले हाँ पर यह समझ न आता था कि न लूँ तो क्या\ सभी कुछ तो लेने काे जी होता था।
Section 6 of 'बाजार दर्शन' by Jainendra Kumar. Read the Hindi passage; use Words tab for hard words.
कुछ लेने का मतलब था शेषा सब-कुछ काे छोड़ देना। पर मैं कुछ भी नहीं छोड़ना चाहता था। इससे मैं कुछ भी नहीं ले सका। मैंने कहा खूब! पर मिता की बात ठीक थी। अगर ठीक पता नहीं है कि क्या चाहते हो तो सब ओर की चाह तुम्हें घेर लेगी। और तब परिणाम तास ही होगा] गति नहीं होगी] न कम़। बाजार में एक जादू है। वह जादू आँख की राह काम करता है। वह :प का जादू है पर जैसे चंुबक का जादू लोहे पर ही चलता है] वैसे ही इस जादू की भी मया़दा है। जेब भरी हो] और मन खाली हो] ऐसी हालत में जादू का असर खूब होता है। जेब खाली पर मन भरा न हो] तो भी जादू चल जाएगा। मन खाली है तो बाजार की अनेकानेक चीजों का निमंताण उस तक पहुँच जाएगा। कहीं हुई उस वक्त जेब भरी तब तो फिर वह मन किसकी मानने वाला है! मालूम होता है यह भी लूँ] वह भी लूँ। सभी सामान ज:री और आराम काे बढ़ाने वाला मालूम होता है। पर यह सब जादू का असर है। जादू की सवारी उतरी कि पता चलता है कि प़्ौंफसी चीजों की बहुतायत आराम में मदद नहीं देती] बल्कि खलल ही डालती है।
Section 7 of 'बाजार दर्शन' by Jainendra Kumar. Read the Hindi passage; use Words tab for hard words.
थोड़ी देर काे स्वाभिमान काे ज:र सेंक मिल जाता है पर इससे अभिमान की गिल्टी की और खुराक ही मिलती है। जकड़ रेशमी डोरी की हो तो रेशम के स्पश़ के मुलायम के कारण क्या वह कम जकड़ होगी\ पर उस जादू की जकड़ से बचने का एक सीधा-सा उपाय है। वह यह कि बाजार जाओ तो खाली मन न हो। मन खाली हो] तब बाजार न जाओ। कहते हैं लू में जाना हो तो पानी पीकर जाना चाहिए। पानी भीतर हो] लू का लूपन व्यथ़ हो जाता है। मन ल{य में भरा हो तो बाजार भी पैफला-का-पैफला ही रह जाएगा। तब वह घाव बिलकुल नहीं दे सकेगा] बल्कि कुछ आनंद ही देगा। तब बाजार तुमसे व्फताथ़ होगा] क्योंकि तुम कुछ-न-कुछ सच्चा लाभ उसे दोगे। बाजार की असली व्फताथ़ता है आवश्यकता के समय काम आना। यहाँ एक अंतर चीन्ह लेना बहुत ज:री है। मन खाली नहीं रहना चाहिए] इसका मतलब यह नहीं है कि वह मन बंद रहना चाहिए। जो बंद हो जाएगा] वह शून्य हो जाएगा। शून्य बाजार दश़ऩ होने का अधिाकार बस परमाऋमा का है जो सनातन भाव से संपूण़ है। शेषा सब अपूण़ है। इससे मन बंद नहीं रह सकता।
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सब इच्छाओं का निरोधा कर लोगे] यह झूठ है और अगर ^इच्छानिरोधास्तपः* का ऐसा ही नकाराऋमक अथ़ हो तो वह तप झूठ है। वैसे तप की राह रेगिस्तान काे जाती होगी] मोक्ष की राह वह नहीं है। ठाठ देकर मन काे बंद कर रखना जड़ता है। लोभ का यह जीतना नहीं है कि जहाँ लोभ होता है] यानी मन में] वहाँ नकार हो! यह तो लोभ की ही जीत है और आदमी की हार। आँख अपनी फोड़ डाली] तब लोभनीय के दश़न से बचे तो क्या हुआ\ ऐसे क्या लोभ मिट जाएगा\ और काैन कहता है कि आँख फूटने पर :प दीखना बंद हो जाएगा\ क्या आँख बंद करके ही हम सपने नहीं लेते हैं\ और वे सपने क्या चैन-भंग नहीं करते हैं\ इससे मन काे बंद कर डालने की काेशिश तो अच्छी नहीं। वह अकारथ है यह तो हठवाला योग है। शायद हठ-ही-हठ है] योग नहीं है। इससे मन व्फश भले हो जाए और पीला और अशक्त जैसे वि}ान का ज्ञान। वह मुक्त ऐसे नहीं होता। इससे वह व्यापक की जगह संकीण़ और विराट की जगह क्षुद्र होता है। इसलिए उसका रोम-रोम मूँदकर बंद तो मन काे करना नहीं चाहिए।
Section 9 of 'बाजार दर्शन' by Jainendra Kumar. Read the Hindi passage; use Words tab for hard words.
वह मन पूण़ कब है\ हम में पूण़ता होती तो परमाऋमा से अभिÂ हम महाशून्य ही न होते\ अपूण़ हैं] इसी से हम हैं। सच्चा ज्ञान सदा इसी अपूण़ता के बोधा काे हम में गहरा करता है। सच्चा कम़ सदा इस अपूण़ता की स्वीव्फति के साथ होता है। अतः उपाय काेई वही हो सकता है जो बलात्मन काे रोकने काे न कहे] जो मन काे भी इसलिए सुने क्योंकि वह अप्रयोजनीय :प में हमें नहीं प्राप्त हुआ है। हाँ] मनमानेपन की छूट मन काे न हो] क्योंकि वह अखिल का अंग है] खुद कुल नहीं है। पड़ोस में एक महानुभाव रहते हैं जिनकाे लोग भगत जी कहते हैं। चूरन बेचते हैं। यह काम करते] जाने उन्हें कितने बरस हो गए हैं। लेकिन किसी एक भी दिन चूरन से उन्होंने छः आने पैसे से जयादा नहीं कमाए। चूरन उनका आस-पास सरनाम है। और खुद खूब लोकप्रिय हैं। कहीं व्यवसाय का गुर पकड़ लेते और उस पर चलते तो आज खुशहाल क्या मालामाल होते! क्या कुछ उनके पास न होता! इधार दस वषाोएं से मैं देख रहा हूँ] उनका चूरन हाथों-हाथ बिक जाता है।
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पर वह न उसे थोक देते हैं] न व्यापारियों काे बेचते हैं। पेशगी आड़र काेई नहीं लेते। बँधो वक्त पर अपनी चूरन की पेटी लेकर घर से बाहर हुए नहीं कि देखते-देखते छह आने की कमाई उनकी हो जाती है। लोग उनका चूरन लेने काे उऋसुक जो रहते हैं। चूरन से भी अधिाक शायद वह भगत जी के प्रति अपनी सद्भावना का देय देने काे उऋसुक रहते हैं। पर छह आने पूरे हुए नहीं कि भगतजी बाकी चूरन बालकाें काे मुक़त बाँट देते हैं। कभी ऐसा नहीं हुआ है कि काेई उन्हें पच्चीसवाँ पैसा भी दे सके। कभी चूरन में लापरवाही नहीं हुई है] और कभी रोग होता भी मैंने उन्हें नहीं देखा है। और तो नहीं] लेकिन इतना मुझे निश्चय मालूम होता है कि इन चूरनवाले भगत जी पर बाजार का जादू नहीं चल सकता। कहीं आप भूल न कर बैठिएगा। इन पंक्तियों काे लिखने वाला मैं चूरन नहीं बेचता हूँ। जी नहीं] ऐसी हलकी बात भी न सोचिएगा। यह समझिएगा कि लेख के किसी भी मान्य पाठक से उस चूरन वाले काे श्रेष्ठ बताने की मैं हिम्मत कर सकता हूँ।
Section 11 of 'बाजार दर्शन' by Jainendra Kumar. Read the Hindi passage; use Words tab for hard words.
क्या जाने उस भोले आदमी काे अक्षर-ज्ञान तक भी है या नहीं । और बड़ी बातें तो उसे मालूम क्या होंगी। और हम-आप न जाने कितनी बड़ी-बड़ी बातें जानते हैं। इससे यह तो हो सकता है कि वह चूरन वाला भगत हम लोगों के सामने एकदम नाचीज आदमी हो। लेकिन आप पाठकाें की वि}ान श्रेणी का सदस्य होकर भी मैं यह स्वीकार नहीं करना चाहता हूँ कि उस अपदाथ़ प्राणी काे वह प्राप्त है जो हम में से बहुत कम काे शायद प्राप्त है। उस पर बाजार का जादू वार नहीं कर पाता। माल बिछा रहता है] और उसका मन अडिग रहता है। पैसा उससे आगे होकर भीख तक माँगता है कि मुझे लो। लेकिन उसके मन में पैसे पर दया नहीं समाती। वह निम़म व्यक्ति पैसे काे अपने आहत गव़ में बिलखता ही छोड़ देता है। ऐसे आदमी के आगे क्या पैसे की व्यंग्य-शक्ति कुछ भी चलती होगी\ क्या वह शक्ति वंुफठित रहकर सलज्ज ही न हो जाती होगी\ पैसे की व्यंग्य-शक्ति की सुनिए। वह दारफण है। मैं पैदल चल रहा हूँ कि पास ही धाूल उड़ाती निकल गई मोटर।
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