CBSE Class 12 · Hindi 1st Language · आरोह भाग 2
काले मेघा पानी दे
Chapter summary, hard words and model exam answers for CBSE Class 12 Hindi.
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Dharmvir Bharati
Summary
धाम़वीर भारतीधाम़वीर भारतीधाम़वीर भारतीधाम़वीर भारतीधाम़वीर भारती संग्रह)_ बंद गली का आखिरी मकान (कहानी-संग्रह)_ सूरज का सातवाँ घोड़ा] गुनाहों का देवता (उपन्यास)_ अंधा युग (गीतिनाट्य)_ पश्यंती] कहनी-अनकहनी] मानव मूल्य और साहिऋय] ठेले पर हिमालय (निबंधा-संग्रह) अन्य राष्ट्रीय पुरस्कार निधानः सन्१९९७ अपनी सहज प्रव्टिायों काे माराे मत] लेकिन उनके दास भी न बनो। जीवन के सहज प्रवाह में उन्हें आने दो] फलीभूत होने दो। पर यदि वे निरंकुशता से हावी होने लगें तो उन्हें भस्म कर देने की तेजस्विता और आऋमनियंताण भी रखो। गुनाहों का देवता उपन्यास से लोकप्रिय धाम़वीर भारती का आजादी के बाद के साहिऋयकारों में विशिष्ट स्थान है। उनकी कविताएँ] कहानियाँ] उपन्यास] निबंधा] गीतिनाट्य और रिपोता़ज हिंदी साहिऋय की उपलब्धिायाँ हैं। भारती जी के लेखन की एक खासियत यह भी है कि हर उम्र और हर वग़ के पाठकाें के बीच उनकी अलग-अलग रचनाएँ लोकप्रिय हैं।
Section 1 of 'काले मेघा पानी दे' by Dharmvir Bharati. Read the Hindi passage; use Words tab for hard words.
वे मूल :प से व्यक्ति स्वातंत्य] मानवीय संकट एवं रोमानी चेतना के रचनाकार हैं। तमाम सामाजिकता एवं उटारदायिऋवों के बावजूद उनकी रचनाओं में व्यक्ति की स्वतंताता ही सवो़परि है। रफमानियत उनकी रचनाओं में संगीत में लय की तरह मौजूद है। उनका सवा़धिाक लोकप्रिय उपन्यास गुनाहों का देवता एक सरस और भावप्रवण प्रेम कथा है। दूसरे लोकप्रिय उपन्यास सूरज का सातवांँ घोड़ा पर हिंदी पि़्ाफल्म भी बन चुकी है। इस उपन्यास में प्रेम काे केंद्र में रखकर निम्न मधयवग़ की हताशा] आथि़्ाक संघषा़] नैतिक विचलन और अनाचार काे चितिात किया गया है। स्वतंताता के बाद गिरते हुए जीवन मूल्य] अनास्था] मोहभंग] विश्वयुद्धों से उपजा हुआ डर और अमानवीयता की अभिव्यक्ति अंधा युग में हुई है। अंधा युग गीतिसाहिऋय के श्रेष्ठ गीतिनाट्यों में है। मानव मूल्य और साहिऋय पुस्तक समाज-सापेक्षिता काे साहिऋय के अनिवाय़ मूल्य के :प में विवेचित करती है। इन विधाओं के अलावा भारती जी ने निबंधा और रिपोता़ज भी लिखे। उनके ग| लेखन में सहजता और आऋमीयता है।
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बड़ी-से-बड़ी बात वो बातचीत की शैली में कहते हैं और सीधो पाठकाें के मन काे छू लेते हैं। एक लंबे समय तक हिंदी की साप्ताहिक पतिाका धाम़युग (पि़्ाफलहाल प्रकाशन बंद है) के संपादक रहते हुए हिंदी पताकारिता काे सजा-सँवारकर गंभीर पताकारिता का एक मानक बनाया। यहाँ प्रस्तुत संस्मरण काले मेघा पानी दे में लोक-प्रचलित विश्वास और विज्ञान के }ं} का सुंदर चिताण है। विज्ञान का अपना तव़फ है और विश्वास का अपना सामथ्य़। इसमें काैन कितना साथ़क है] यह प्रश्न पढ़े-लिखे समाज काे उ}ेलित करता रहता है। इसी दुविधा काे लेकर लेखक ने पानी के संदभ़ में प्रसंग रचा है। आषाढ़ का पहला पखवारा बीत जाने के बाद भी खेती और बहुकाज प्रयोग के लिए पानी न हो तो जीवन चुनौतियों का घर बन जाता है और उन चुनौतियों का निराकरण विज्ञान न कर पाए तो उऋसवधामी़ भारतीय समाज चुप नहीं बैठता। वह किसी जुगाड़ में लग जाता है] प्रपंच रचता है और हर कीमत पर जीवित रहने के लिए अशिक्षा और बेबसी के भीतर से उपाय और काट की खोज करता है।
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लेखक ने अपने किशोर जीवन के इस संस्मरण में दिखलाया है कि अनाव्ष्टि दूर करने के लिए गाँव के बच्चों की इंदर सेना }ार-}ार पानी माँगते चलती है और लेखक का तव़फशील किशोर मन भीषाण सूखे में उसे पानी की निम़म बरबादी के :प में देखता है। इसे किशोर मन का वितव़फ नहीं] वैज्ञानिक तव़फ ही कहना चाहिए और विज्ञान विषाय की इतने दीघ़काल तक पढ़ाई और विज्ञानोपलब्धा आविष्कारों से अपने जीवन काे भौतिक सुख-सुविधाओं से भरते रहने के बावजूद इस देश के जनमानस में ऐसी वैज्ञानिक द्ष्टि का न जनम पाना अप़्ाफसोसनाक ही कहा जा सकता है। पर जनता के सामूहिक चिटा में बैठे विश्वासों का क्या करें] जिन से संचालित होने वाले कुछ लौकिक कम़कांड संस्व्फति की घटना के :प में हमें लगते हैं।
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यदि वे विश्वास प्रऋयक्षतः जानलेवा या नस्ल-जाति] मजहब और लिंग के आधार पर किसी समुदाय के लिए अपमानजनक हों] तब तो उन्हें अंधाविश्वास कहकर उनका शीघ्रातिशीघ्र निराकरण ही एकमाता कऋा़व्य है] पर यदि कुछ विश्वास विज्ञानसम्मत न होकर भी उक्त तरह से हानिकर न हों तो उनके साथ भी उसी प्रकार का बता़व क्या उचित है\ ऐसा करने में क्या हमारे सांस्व्फतिक मन के खाली-खाली हो जाने का खतरा नहीं है\ काले मेघा पानी दे विश्वास की भी तो एक रचनाऋमक भूमिका हो सकती है आपातकाल में निराशा दूर करने या अधाीरता काे थामने अथवा विभक्त जन-चेतना काे जोड़ने के अथ़ में। अब सवाल रह जाता है कि बारिश के लिए किए जाने वाले उक्त भोले प्रयऋन किस काेटि के अंतग़त हैं\ लेखक ने काेई निण़य नहीं दिया है। पर एक बात स्पष्ट होती है कि जीजी की संतुष्टि और अपने प्रति उनका सद्भाव बचाए रखने के लिए वह उन तमाम रीति-रिवाजों काे उफपरी तौर पर ही सही] अपनाने काे बचपन में बाधय बना रहता था।
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इससे क्या संकेत लिया जा सकता है\ विज्ञान का सऋय बड़ा है या सहज प्रेम का रस\ या दोनों\ धम़वीर भारती काले मेघा पानी देकाले मेघा पानी देकाले मेघा पानी देकाले मेघा पानी देकाले मेघा पानी दे उन लोगों के दो नाम थे इंदर सेना या मेढक-मंडली। बिलकुल एक-दूसरे के विपरीत। जो लोग उनके नग्नस्व:प शरीर] उनकी उछलकूद] उनके शोर-शराबे और उनके कारण गली में होनेवाले कीचड़ काँदो से चिढ़ते थे] वे उन्हें कहते थे मेढक-मंडली। उनकी अगवानी गालियों से होती थी। वे होते थे दस-बारह बरस से सोलह-अठारह बरस के लड़के] साँवला नंगा बदन सिप़्ा़फ एक जाँघिया या कभी-कभी सिप़्ा़फ लंगोटी। एक जगह इक_े होते थे। पहला जयकारा लगता था] “बोल गंगा मैया की जय।, जयकारा सुनते ही लोग सावधान हो जाते थे। स्तिायाँ और लड़कियाँ छज्जे] बारजे से झाँकने लगती थीं और यह विचिता नंग-धाड़ंग टोली उछलती-कूदती समवेत पुकार लगाती थीः काले मेघा पानी दे गिरी फूटी बैल पियासा पानी दे] गुड़धानी दे काले मेघा पानी दे।
Section 6 of 'काले मेघा पानी दे' by Dharmvir Bharati. Read the Hindi passage; use Words tab for hard words.
उछलते-कूदते] एक-दूसरे काे धाकियाते ये लोग गली में किसी दुमहले मकान के सामने रफक जाते] “पानी दे मैया] इंदर सेना आई है।, और जिन घरों में आखीर जेठ या शु: आषाढ़ के उन सूखे दिनों में पानी की कमी भी होती थी] जिन घरों के कुएँ भी सूखे होते थे] उन घरों से भी सहेज कर रखे हुए पानी मंे से बाल्टी या घड़े भर-भर कर इन बच्चों काे सर से पैर तक तर कर दिया जाता था। ये भीगे बदन मि^ी में लोट लगाते थे] पानी पेंफकने से पैदा हुए कीचड़ में लथपथ हो जाते थे।
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हाथ] पाँव] बदन] मुँह] पेट सब पर गंदा कीचड़ मल कर फिर हाँक लगाते “बोल गंगा मैया की जय, और फिर मंडली बाँधा कर उछलते-कूदते अगले घर की ओर चल पड़ते बादलों काे टेरते] “काले मेघा पानी दे।, वे सचमुच ऐसे दिन होते जब गली-मुहल्ला] गाँव-शहर हर जगह लोग गरमी मंे भुन-भुन कर ताहिमाम कर रहे होते] जेठ के दसतपा बीत कर आषाढ़ का पहला पखवारा भी बीत चुका होता पर क्षितिज पर कहीं बादल की रेख भी नहीं दीखती होती] कुएँ सूखने लगते] नलों में एक तो बहुत कम पानी आता और आता भी तो आधाी रात काे भी मानो खौलता हुआ पानी हो। शहरों की तुलना में गाँव में और भी हालत खराब होती थी। जहाँ जुताई होनी चाहिए वहाँ खेतों की मि^ी सूख कर पऋथर हो जाती] फिर उसमें पिड़ी पड़ कर जमीन फटने लगती] लू ऐसी कि चलते-चलते आदमी आधो रास्ते मंे लू खा कर गिर पड़े। ढोर-ढंगर प्यास के मारे मरने लगते लेकिन बारिश का कहीं नाम निशान नहीं] ऐसे में पूजा-पाठ कथा-विधान सब करके लोग जब हार जाते तब अंतिम उपाय के :प में निकलती यह इंदर सेना।
Section 8 of 'काले मेघा पानी दे' by Dharmvir Bharati. Read the Hindi passage; use Words tab for hard words.
वषा़ के बादलों के स्वामी] हैं इंद्र और इंद्र की सेना टोली बाँधा कर कीचड़ में लथपथ निकलती] पुकारते हुए मेघों काे] पानी माँगते हुए प्यासे गलों और सूखे खेतों के लिए। पानी की आशा पर जैसे सारा जीवन आकर टिक गया हो। बस एक बात मेरे समझ में नहीं आती थी कि जब चाराें ओर पानी की इतनी कमी है तो लोग घर मंे इतनी कठिनाई से इक_ा करके रखा हुआ पानी बाल्टी भर-भर कर इन पर क्यों पेंफकते हैं। वैफसी निम़म बरबादी है पानी की। देश काले मेघा पानी दे की कितनी क्षति होती है इस तरह के अंधाविश्वासों से। काैन कहता है इन्हंे इंद्र की सेना\ अगर इंद्र महाराज से ये पानी दिलवा सकते हैं तो खुद अपने लिए पानी क्यों नहीं माँग लेते\ ऐसे ही अंधाविश्वासों के कारण हम अंग्रेजों से पिछड़ गए और गुलाम बन गए। मैं असल में था तो इन्हीं मेढक-मंडली वालों की उमर का] पर कुछ तो बचपन के आय़समाजी संस्कार थे और एक कुमार-सुधार सभा कायम हुई थी उसका उपमंताी बना दिया गया था सो समाज-सुधार का जोश कुछ जयादा ही था।
Section 9 of 'काले मेघा पानी दे' by Dharmvir Bharati. Read the Hindi passage; use Words tab for hard words.
अंधाविश्वासों के खिलाप़्ाफ तो तरकस में तीर रख कर घूमता रहता था। मगर मुश्किल यह थी कि मुझे अपने बचपन में जिससे सबसे जयादा प्यार मिला वे थीं जीजी। यूँ मेरी रिश्ते में काेई नहीं थीं। उम्र में मेरी माँ से भी बड़ी थीं] पर अपने लड़के-बहू सबकाे छोड़ कर उनके प्राण मुझी में बसते थे। और वे थीं उन तमाम रीति-रिवाजों] तीज-ऋयोहाराें] पूजा-अनुष्ठानों की खान जिन्हें कुमार-सुधार सभा का यह उपमंताी अंधाविश्वास कहता था] और उन्हें जड़ से उखाड़ पेंफकना चाहता था। पर मुश्किल यह थी कि उनका काेई पूजा-विधान] काेई ऋयोहार अनुष्ठान मेरे बिना पूरा नहीं होता था। तो रोज आठ दिन की झाँकी तक काे सजाने और पँजीरी बाँटने में लगा हूँ] हर-छठ है तो छोटी रंगीन कुल्हियों में भूजा भर रहा हूँ। किसी में भुना चना] किसी में भुनी मटर] किसी में भुने अरवा चावल] किसी में भुना गेहूँ। जीजी यह सब मेरे हाथों से करातीं] ताकि उनका पु.य मुझे मिले। केवल मुझे। लेकिन इस बार मैंने साप़्ाफ इनकार कर दिया।
Section 10 of 'काले मेघा पानी दे' by Dharmvir Bharati. Read the Hindi passage; use Words tab for hard words.
नहीं पेंफकना है मुझे बाल्टी भर-भर कर पानी इस गंदी मेढक-मंडली पर। जब जीजी बाल्टी भर कुर पानी ले गएं उनके बूढ़े पाँव डगमगा रहे थे] हाथ काँप रहे थे] तब भी मैं अलग मुँह पुफलाए खड़ा रहा। शाम काे उन्होंने लंू-मठरी खाने काे दिए तो मैंने उन्हें हाथ से अलग खिसका दिया। मुँह पेफरकर बैठ गया] जीजी से बोला भी नहीं। पहले वे भी तमतमाई] लेकिन जयादा देर तक उनसे गुस्सा नहीं रहा गया। पास आ कर मेरा सर अपनी गोद मंे लेकर बोलीं] “देख भइया :ठ मत। मेरी बात सुन। यह सब अंधाविश्वास नहीं है। हम इन्हें पानी नहीं देंगे तो इंद्र भगवान हमें पानी वैफसे देंगे\, मैं कुछ नहीं बोला। फिर जीजी बोलीं। “तू इसे पानी की बरबादी समझता है पर यह बरबादी नहीं है।
Section 11 of 'काले मेघा पानी दे' by Dharmvir Bharati. Read the Hindi passage; use Words tab for hard words.
यह पानी का अघ्य़ चढ़ाते हैं] जो चीज मनुष्य पाना चाहता है उसे पहले देगा नहीं तो पाएगा वैफसे\ इसीलिए ऋषिा-मुनियों ने दान काे सबसे ऊँचा स्थान दिया है।, “ऋषिा-मुनियों काे काहे बदनाम करती हो जीजी\ क्या उन्होंने कहा था कि जब आदमी बूँद-बूँद पानी काे तरसे तब पानी कीचड़ में बहाओ।, काले मेघा पानी दे कुछ देर चुप रही जीजी] फिर मठरी मेरे मुँह में डालती हुई बोलीं] “देख बिना ऋयाग के दान नहीं होता। अगर तेरे पास लाखों-करोड़ों रफपये हैं और उसमें से तू दो-चार रफपये किसी काे दे दे तो यह क्या ऋयाग हुआ। ऋयाग तो वह होता है कि जो चीज तेरे पास भी कम है] जिसकी तुझकाे भी ज:रत है तो अपनी ज:रत पीछे रख कर दूसरे के कल्याण के लिए उसे दे तो ऋयाग तो वह होता है] दान तो वह होता है] उसी का फल मिलता है।, “फल-वल कुछ नहीं मिलता सब ढकाेसला है।, मैंने कहा तो] पर कहीं मेरे तकाेएं का किला पस्त होने लगा था। मगर मैं भी जिख पर अड़ा था। फिर जीजी बोलीं] “देख तू तो अभी से पढ़-लिख गया है। मैंने तो गाँव के मदरसे का भी मुँह नहीं देखा।
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