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CBSE Class 12 · Hindi 1st Language · आरोह भाग 2

भक्तिन

Chapter summary, hard words and model exam answers for CBSE Class 12 Hindi.

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Mahadevi Verma

Summary

शिक्षा और स्वतंत्ताशिक्षा और स्वतंत्ताशिक्षा और स्वतंत्ताशिक्षा और स्वतंत्ताशिक्षा और स्वतंत्ता बच्चों काे स्वाद्ीन बनाअबच्चों काे स्वाद्ीन बनाअबच्चों काे स्वाद्ीन बनाअबच्चों काे स्वाद्ीन बनाअबच्चों काे स्वाद्ीन बनाओ बच्चों में स्वाद्ीनता के भाव पैदा करने के लिए यह ज:रत है कि जितनी जल्दी हो सके] उन्हें कुछ काम करने का अवसर दिया जाए। … इसका मतलब यह है कि बाहरी दबाव की जगह हममें आऋम-संयम का उदय हो। सच्चा स्वाधाीन आदमी वही है] जिसका जीवन आऋमा के शासन से संयमित हो जाता है] जिसे किसी बाहरी दबाव की ज:रत नहीं पड़ती।

Section 1 of 'भक्तिन' by Mahadevi Verma. Read the Hindi passage; use Words tab for hard words.

प्रेमचंद (हंस] १९३०) महादेवी वमा़महादेवी वमा़महादेवी वमा़महादेवी वमा़महादेवी वमा़ की कडि़याँ] आपदा] संकल्पिता] भारतीय संस्व्फति के स्वर (निबंधा-संग्रह)_ अतीत के चलचिता] स्म्ति की रेखाएँ] पथ के साथी] मेरा परिवार (संस्मरण@रेखाचिता) प्रमुख पुरस्कारः ज्ञानपीठ पुरस्कार (^यामा* संग्रह के लिए १९८३ ई- में)] उटार प्रदेश हिंदी संस्थान का भारत भारती पुरस्कार] पद्मभूषाण (१९५६ ई-) निधानः सन्१९८७] इलाहाबाद जीवित कहा जा सकता है जिसके त्रदय और मस्तिष्क ने समुचित विकास पाया हो और जो अपने व्यक्तिऋव }ारा मनुष्य समाज से रागाऋमक के अतिरिक्त बौद्धिक संबंधा भी स्थापित कर सकने में समथ़ हो। साहिऋय सेवी और समाज सेवी दोनों :पों में महादेवी वमा़ की प्रतिष्ठा रही है। महाऋमा गांधाी की दिखाई राह पर अपना जीवन समपि़त कर उन्होंने शिक्षा और समाज-कल्याण के क्षेता में निरंतर काय़ किया। नारी-समाज मेंे शिक्षा-प्रसार के उखेश्य से उन्होंने प्रयाग महिला वि|ापीठ की स्थापना की।

Section 2 of 'भक्तिन' by Mahadevi Verma. Read the Hindi passage; use Words tab for hard words.

साहिऋय जगत में महादेवी वमा़ की प्रतिष्ठा बहुमुखी प्रतिभा के रचनाकार के :प में रही है। अगर कविता के क्षेता में वे छायावाद के चार स्तंभों में से एक मानी जाती हैं (अन्य तीन हैं पंत] प्रसाद और निराला)] तो अपने निबंधाों और संस्मरणाऋमक रेखाचिताों के कारण एक अप्रतिम ग|कार के :प में उनकी चचा़ होती रही है। कविता और ग| इन दोनों क्षेताों में उनकी प्रतिभा अलग-अलग स्वभाव लेकर सक्रिय हुई दिखती है। कविताओं में वे अपनी आंतरिक वेदना और पीड़ा काे व्यक्त करती हुई इस लोक से परे किसी और सटा की ओर अभिमुख दिखलाई पड़ती हैं] तो अपने ग| में उनका गहरा सामाजिक सरोकार स्थान पाता है। उनकी Üां्खला की कडि़याँ (१९४२ ई-) उस समय की अि}तीय रचना है] जो हिंदी में स्ताी-विमश़ की भव्य प्रस्तावना है।

Section 3 of 'भक्तिन' by Mahadevi Verma. Read the Hindi passage; use Words tab for hard words.

उनके संस्मरणाऋमक रेखाचिता अपने आस पास के ऐसे चरिताों और प्रसंगों काे लेकर लिखे गए हैं] जिनकी साधारणता हमारा धयान नहीं खींच पाती लेकिन महादेवी जी की मम़भेदी और करफणामयी द्ष्टि उन चरिताों की साधारणता में असाधारण तटवों का संधान करती है। इस तरह समाज के शोषिात-पीडि़त तबके काे उन्होंने अपनी ग|-रचनाओं में नायकऋव प्रदान किया है। उनके इस प्रयास ने हिंदी के साहिऋयक समाज पर ऐसा गहरा असर डाला कि संस्मरणाऋमक रेखाचिता की विधा के लिए शोषिात-पीडि़त आम जन काे विषाय-वस्तु के :प में मान्यता मिल गई है। भक्तिन महादेवी जी का प्रसिद्ध संस्मरणाऋमक रेखाचिता है जो स्म्ति की रेखाएँ में संकलित है। इसमें महादेवी जी ने अपनी सेविका भक्तिन के अतीत और वत़मान का परिचय देते हुए उसके व्यक्तिऋव का बहुत दिलचस्प खाका खींचा है।

Section 4 of 'भक्तिन' by Mahadevi Verma. Read the Hindi passage; use Words tab for hard words.

महादेवी के घर में काम शु: करने से पहले उसने वैफसे एक संघषा़शील] स्वाभिमानी और कम़ठ जीवन जिया] वैफसे पित्सटाऋमक-मान्यताओं और छल-छद्म भरे समाज में अपने और अपनी बेटियों के हक की लड़ाई लड़ती रही और उसमें हार कर वैफसे जिंदगी की राह पूरी तरह बदल लेने के निण़य तक पहुँची। इसका अऋयंत संवेदनशील चिताण इस पाठ में हुआ है। इसके साथ] भक्तिन महादेवी जी के जीवन में आकर छा जाने वाली एक ऐसी परिस्थिति के :प में दिखलाई पड़ती है] जिसके कारण लेखिका के व्यक्तिऋव के कई अनछुए @ प्रच्छन्न आयाम उद्घाटित होते चलते हैं। इसी कारण अपने व्यक्तिऋव का ज:री अंश मानकर वे भक्तिन काे खोना नहीं चाहतीं। समग्रतः इस पाठ काे परिस्थितिवश अक्खड़ बनी] पर महादेवी के प्रति अनमोल आऋमीयता से भरी भक्तिन के बहाने स्ताी-अस्मिता की संघषा़पूण़ आवाज के :प में भी पढ़ा जाना चाहिए।

Section 5 of 'भक्तिन' by Mahadevi Verma. Read the Hindi passage; use Words tab for hard words.

भक्तिन भक्तिनभक्तिन भक्तिनभक्तिन छोटे कद और दुबले शरीरवाली भक्तिन अपने पतले ओठों के काेनों में द्ढ़ संकल्प और छोटी आँखों में एक विचिता समझदारी लेकर जिस दिन पहले-पहले मेरे पास आ उपस्थित हुई थी तब से आज तक एक युग का समय बीत चुका है। पर जब काेई जिज्ञासु उससे इस संबंधा में प्रश्न कर बैठता है] तब वह पलकाें काे आधाी पुतलियों तक गिराकर और चिंतन की मुद्रा में ठु ंी काे कुछ उफपर उठाकर विश्वास भरे कंठ से उटार देती है ^तुम पचै का का बताई यहै पचास बरिस से संग रहित है।* इस हिसाब से मैं पचहटार की ठहरती हूँ और वह सौ वषा़ की आयु भी पार कर जाती है] इसका भक्तिन काे पता नहीं। पता हो भी] तो संभवतः वह मेरे साथ बीते हुए समय में रटाी भर भी कम न करना चाहेगी। मुझे तो विश्वास होता जा रहा है कि कुछ वषा़ और बीत जाने पर वह मेरे साथ रहने के समय काे खींच कर सौ वषा़ तक पहुँचा देगी] चाहे उसके हिसाब से मुझे डेढ़ सौ वषा़ की असंभव आयु का भार क्यों न ढोना पड़े।

Section 6 of 'भक्तिन' by Mahadevi Verma. Read the Hindi passage; use Words tab for hard words.

सेवक-धाम़ में हनुमान जी से स्पद्धा़ करने वाली भक्तिन किसी अंजना की पुताी न होकर एक अनामधान्या गोपालिका की कन्या है नाम है लछमिन अथा़त ल{मी। पर जैसे मेरे नाम की विशालता मेरे लिए दुव़ह है] वैसे ही ल{मी की सम्द्धि भक्तिन के कपाल की कुंचित रेखाओं में नहीं बँधा सकी। वैसे तो जीवन में प्रायः सभी काे अपने-अपने नाम का विरोधाभास लेकर जीना पड़ता है_ पर भक्तिन बहुत समझदार है] क्योंकि वह अपना सम्द्धि-सूचक नाम किसी काे बताती नहीं। केवल जब नौकरी की खोज में आई थी] तब ईमानदारी का परिचय देने के लिए उसने शेषा इतिव्टा के साथ यह भी बता दिया_ पर इस प्राथ़ना के साथ कि मैं कभी नाम का उपयोग न क:ँ । उपनाम रखने की प्रतिभा होती] तो मैं सबसे पहले उसका प्रयोग अपने उफपर करती] इस तथ्य काे वह देहातिन क्या जाने] इसी से जब मैंने कंठी माला देखकर उसका नया नामकरण किया तब वह भक्तिन-जैसे कविऋवहीन नाम काे पाकर भी गाद्गद हो उठी। भक्तिन के जीवन का इतिव्टा बिना जाने हुए उसके स्वभाव काे पूण़तः क्या अंशतः समझना भी कठिन होगा।

Section 7 of 'भक्तिन' by Mahadevi Verma. Read the Hindi passage; use Words tab for hard words.

वह ऐतिहासिक झूँसी में गाँव-प्रसिद्ध एक सूरमा की एकलौती बेटी ही नहीं] विमाता की किंवदंती बन जाने वाली मिता की छाया में भी पली है। पाँच वषा़ की वय में उसे हँडिया ग्राम के एक संपन्न गोपालक की सबसे छोटी पुतावधाू बनाकर पिता ने शास्ता से दो पग आगे रहने की ख्याति कमाई और नौ वषाी़या युवती का गौना देकर विमाता ने] बिना माँगे पराया धान लौटाने वाले महाजन का पु.य लूटा। पिता का उस पर अगाधा पे्रम होने के कारण स्वभावतः ईष्या़लु और संपटिा की रक्षा में सतव़फ विमाता ने उनके मरणांतक रोग का समाचार तब भेजा] जब वह म्ऋयु की सूचना भी बन चुका था। रोने-पीटने के अपशकुन से बचने के लिए सास ने भी उसे कुछ न बताया। बहुत दिन से नैहर नहीं गई] सो जाकर देख आवे] यही कहकर और पहना-उढ़ाकर सास ने उसे विदा कर दिया। इस अप्रऋयाशित अनुग्रह ने उसके पैरों में जो पंख लगा दिए थे] वे गाँव की सीमा में पहुँचते ही झड़ गए। ^हाय लछमिन अब आई* की अस्पष्ट पुनराव्टिायाँ और स्पष्ट सहानुभूतिपूण़ द्ष्टियाँ उसे घर तक ठेल ले गएं।

Section 8 of 'भक्तिन' by Mahadevi Verma. Read the Hindi passage; use Words tab for hard words.

पर वहाँ न पिता का चिÉ शेषा था] न विमाता के व्यवहार में शिष्टाचार का लेश था। दुख से शिथिल और अपमान से जलती हुई वह उस घर में पानी भी बिना पिए उलाटे पैरों ससुराल लौट पड़ी। सास काे खरी-खोटी सुनाकर उसने विमाता पर आया हुआ व्रफोधा शांत किया और पति के उफपर गहने पेंफक-पेंफकिर उसने पिता के चिर विछोह की मम़व्यथा व्यक्त की। जीवन के दूसरे परिच्छेद में भी सुख की अपेक्षा दुख ही अधिाक है। जब उसने गेहँुए रंग और बटिया जैसे मुख वाली पहली कन्या के दो संस्करण और कर डाले तब सास और जिठानियों ने ओठ बिचकाकर उपेक्षा प्रकट की। उचित भी था] क्योंकि सास तीन-तीन कमाउफ वीरों की विधाताी बनकर मचिया के उफपर विराजमान पुरखिन के पद पर अभिषिाक्त हो चुकी थी और दोनों जिठानियाँ काक-भुशंडी जैसे काले लालों की व्रफमबद्ध स्ष्टि करके इस पद के लिए उम्मीदवार थीं। छोटी बहू के लीक छोड़कर चलने के कारण उसे दंड मिलना आवश्यक हो गया।

Section 9 of 'भक्तिन' by Mahadevi Verma. Read the Hindi passage; use Words tab for hard words.

जिठानियाँ बैठकर लोक-चचा़ करतीं और उनके कलूटे लड़के धाूल उड़ाते_ वह म _ा पेफरती] कूटती] पीसती] राँधाती और उसकी नन्ही लड़कियाँ गोबर उठातीं] कंडे पाथतीं। जिठानियाँ अपने भात पर सप़्ोफद राब रखकर गाढ़ा दूधा डालतीं और अपने लड़काें काे औटते हुए दूधा पर से मलाई उतारकर खिलातीं। वह काले गुड़ की डली के साथ कठौती में म _ा पाती और उसकी लड़कियाँ चने-बाजरे की घुघरी चबातीं । इस दंड-विधान के भीतर काेई ऐसी धारा नहीं थी] जिसके अनुसार खोटे सिक्काें की टकसाल-जैसी पऋनी से पति काे विरक्त किया जा सकता। सारी चुगली-चबाई की परिणति] उसके पऋनी-प्रेम काे बढ़ाकर ही होती थी। जिठानियाँ बात-बात पर धामाधाम पीटी-कूटी जातीं_ पर उसके पति ने उसे कभी उँगली भी नहीं छुआई। वह बड़े बाप की बड़ी बात वाली भक्तिन बेटी काे पहचानता था। इसके अतिरिक्त परिश्रमी] तेजस्विनी और पति के प्रति रोम-रोम से सच्ची पऋनी काे वह चाहता भी बहुत रहा होगा] क्योंकि उसके प्रेम के बल पर ही पऋनी ने अलगौझा करके सबकाे अँगूठा दिखा दिया।

Section 10 of 'भक्तिन' by Mahadevi Verma. Read the Hindi passage; use Words tab for hard words.

काम वही करती थी] इसलिए गाय-भैंस] खेत-खलिहान] अमराई के पेड़ आदि के संबंधा में उसी का ज्ञान बहुत बढ़ा-चढ़ा था। उसने छाँट-छाँट कर] उफपर से असंतोषा की मुद्रा के साथ और भीतर से पुलकित होते हुए जो कुछ लिया] वह सबसे अच्छा भी रहा] साथ ही परिश्रमी दंपति के निरंतर प्रयास से उसका सोना बन जाना भी स्वाभाविक हो गया। धाूमधाम से बड़ी लड़की का विवाह करने के उपरांत] पति ने घरौंदे से खेलती हुई दो कन्याओं और कच्ची ग्हस्थी का भार उनातीस वषा़ की पऋनी पर छोड़कर संसार से विदा ली। जब वह मरा] तब उसकी अवस्था छटाीस वषा़ से कुछ ही अधिाक रही होगी_ पर पऋनी आज उसे बुढ़उफ कह कर स्मरण करती है। भक्तिन सोचती है कि जब वह बूढ़ी हो गई] तब क्या परमाऋमा के यहाँ वे भी न बुढ़ा गए होंगे] अतः उन्हें बुढ़उफ न कहना उनका घोर अपमान है। हाँ] तो भक्तिन के हरे-भरे खेत] मोटी-ताजी गाय-भैंस और फलों से लदे पेड़ देखकर जेठ-जिठौतों के मुँह में पानी भर आना ही स्वाभाविक था। इन सबकी प्राप्ति तो तभी संभव नहीं।

Section 11 of 'भक्तिन' by Mahadevi Verma. Read the Hindi passage; use Words tab for hard words.

उसने व्रफोधा से पाँव पटक-पटकिर आँगन काे कंपायमान करते हुए कहा ^हम कुकुरी बिलारी न होयँ] हमार मन पुसाई तौ हम दूसरा के जाब नाहिं त तुम्हार पचै की छाती पै होरहा भँूजब और राज करब] समुझे रहौ।* उसने ससुर] अजिया ससुर और जाने वैफ पीढि़यों के ससुरगणों की उपाजि़्ात जगह-जमीन में से सुई की नोक बराबर भी देने की उदारता नहीं दिखाई। इसके अतिरिक्त गुरफ से कान पँॉुफकवा] कंठी बाँधा और पति के नाम पर घी से चिकने केशों काे समपि़त कर अपने कभी न टलने की घोषाणा कर दी। भविष्य में भी संपटिा सुरक्षित रखने के लिए उसने छोटी लड़कियों के हाथ पीले कर उन्हें ससुराल पहुँचाया और पति के चुने हुए बड़े दामाद काे घरजमाई बनाकर रखा। इस प्रकार उसके जीवन का तीसरा परिच्छेद आरंभ हुआ। भक्तिन का दुभा़ग्य भी उससे कम हठी नहीं था] इसी से किशोरी से युवती होते ही बड़ी लड़की भी विधावा हो गई। भइयहू से पार न पा सकने वाले जेठों और काकी काे परास्त करने के लिए कटिबद्ध जिठौतों ने आशा की एक किरण देख पाई।

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