CBSE Class 12 · Hindi 1st Language · आरोह भाग 2
श्रम विभाजन और जाति-प्रथा, मेरी कल्पना का आदर्श समाज
Chapter summary, hard words and model exam answers for CBSE Class 12 Hindi.
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Dr B.R. Ambedkar
Summary
बाबा साहेब भीमराव आंबेडकरबाबा साहेब भीमराव आंबेडकरबाबा साहेब भीमराव आंबेडकरबाबा साहेब भीमराव आंबेडकरबाबा साहेब भीमराव आंबेडकर जेनेसिस एंड डेवलपमेंट (१९१७] प्रथम प्रकाशित व्फति)_ द अनटचेबल्स] हू आर दे\ (१९४८)_ हू आर द शूद्राज (१९४६)_ बुद्धा एंड हिज धाम्मा (१९५७)_ थाट्स ऑन लिंग्युस्टिक स्टेट्स (१९५५)_ द प्राॉब्लम ऑप़्ाफ द रफपी(१९२३)_ द एबोलुशन ऑप़् फ प्रोविंशियल प़् फायनांस इन ब्रिटिश इंडिया (पीएच-डी- की थीसिस] १९१६)_ द राइज एंड प़्ाफाॉल ऑप़्ाफ द हिंदू वीमैन (१९६५)_ एनीहिलेशन ऑप़् फ कास्ट(१९३६)_ लेबर एंड पालि़यामेंट्री डैमोक्रेसी(१९४३)_ बुद्धिजम एंड कम्युनिजम(१९५६)] (पुस्तवेंफ व भाषाण)_ मूक नायक] बहिष्व्फत भारत] जनता(पतिाका-संपादन)_ हिंदी में उनका संपूण़ वाÄ्मय भारत सरकार के कल्याण मंतालय निधानः दिसंबर] सन्१९५६ दिल्ली में अगर इंसानों के अनु:प जीने की सुविध कुछ लोगों तक ही सीमित है] तब जिस सुविधा काे आमतौर पर स्वतंताता कहा जाता है] उसे विशेषाधिाकार कहना उचित है।
Section 1 of 'श्रम विभाजन और जाति-प्रथा, मेरी कल्पना का आदर्श समाज' by Dr B.R. Ambedkar. Read the Hindi passage; use Words tab for hard words.
मानव-मुक्ति के पुरोध बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर अपने समय के सबसे सुपठित जनों में से एक थे। प्राथमिक शिक्षा के बाद बड़ौदा नरेश के प्रोऋसाहन पर उच्चतर शिक्षा के लिए न्यूयाव़फ(अमेरिका)फिर वहाँ से लंदन गए। उन्होंने संस्व्फत का धमि़क] पौराणिक और पूरा वैदिक वाÄ्मय अनुवाद के जरिये पढ़ा और ऐतिहासिक-सामाजिक क्षेता में अनेक मौलिक स्थापनाएँ प्रस्तुत कीं। सब मिलाकर वे इतिहास-मीमांसक] विधिावेटा] अथ़शास्ताी] समाजशास्ताी] शिक्षाविद्तथा धाम़-दश़न के व्याख्याता बन कर उभरे। स्वदेश में कुछ समय उन्होंने वकालत भी की। समाज और राजनीति में बेहद सक्रिय भूमिका निभाते हुए उन्होंने अछूतों] स्तिायों और श्रम विभाजन और जाति-प्रथा १२१ भारतीय संविधान के निमा़ताओं में से एक डाॉ- भीमराव अंाबेडकर आधाुनिक भारतीय चिंतन में अऋयंत महटवपूण़ स्थान के अधिाकारी हैं। उन्होंने जीवन भर दलितों की मुक्ति एवं सामाजिक समता के लिए संघषा़ किया। उनका पूरा लेखन इसी संघषा़ और सरोकार से जुड़ा उऋपीड़न-शोषाण एवं अपमान से गुजरना पड़ा था।
Section 2 of 'श्रम विभाजन और जाति-प्रथा, मेरी कल्पना का आदर्श समाज' by Dr B.R. Ambedkar. Read the Hindi passage; use Words tab for hard words.
इसीलिए वि|ालय के दिनों में जब एक अधयापक ने उनसे पूछा कि “तुम पढ़-लिख कर क्या बनोगे\, तो बालक भीमराव ने जवाब दिया था मैं पढ़-लिख कर वकील बनूँगा] अछूतों के लिए नया कानून बनाऊँगा और छुआछूत काे खऋम क:ँगा। डाॉ- अंाबेडकर ने अपना पूरा जीवन इसी संकल्प के पीछे झोंक दिया। इसके लिए उन्होंने जमकर पढ़ाई की। व्यापक अधयिन एवं चिंतन-मनन के बल पर उन्होंने हिंदुस्तान के स्वाधाीनता संग्राम में एक नयी अंतव़स्तु भरने का काम किया। वह यह था कि दासता का सबसे व्यापक व गहन :प सामाजिक दासता है और उसके उन्मूलन के बिना काेई भी स्वतंताता कुछ लोगों का विशेषाधिाकार रहेगी] इसलिए अधाूरी होगी। उनके चिंतन व रचनाऋमकता के मुख्यतः तीन प्रेरक व्यक्ति रहे बुद्ध] कबीर और ज्योतिबा पुफले। जातिवादी उऋपीड़न के कारण हिंदू समाज से मोहभंग होने के बाद वे बुद्ध के समतावादी दश़न में आश्वस्त हुए और १४ अक्तूबर] सन्१९५६ काे ५ लाख अनुयायियों के साथ बौद्ध मतानुयायी बन गए।
Section 3 of 'श्रम विभाजन और जाति-प्रथा, मेरी कल्पना का आदर्श समाज' by Dr B.R. Ambedkar. Read the Hindi passage; use Words tab for hard words.
भारत के संविधान-निमा़ण में उनकी महती भूमिका और एकनिष्ठ समप़ण के कारण ही हम आज उन्हें भारतीय संविधान का निमा़ता कह कर श्रद्धांजलि अपि़त करते हैं। उनकी समूची बहुमुखी वि}टा एकांत ज्ञान-साधाना की जगह मानव-मुक्ति व जन-कल्याण के लिए थी यह बात वे अपने चिंतन और क्रिया के क्षणों से बराबर साबित करते रहे। अपने इस प्रयोजन में वे अधिाकतर सफल भी हुए। यहाँ प्रस्तुत पाठ आंबेडकर के विख्यात भाषाण एनीहिलेशन ऑप़्ाफ कास्ट (१९३६) के ललई सिंह यादव }ारा व्फत हिंदी-:पांतर जाति-भेद का उच्छेद के दो प्रकरणों के तौर पर है। यह भाषाण जाति-पाँति तोड़क मंडल (लाहौर) के वाषिा़क सम्मेलन (सन्१९३६) के अधयक्षीय भाषाण के :प में तैयार किया गया था_ परंतु इसकी क्रांतिकारी द्ष्टि से आयोजकाें की पूण़तः सहमति न बन सकने के कारण सम्मेलन ही स्थगित हो गया और यह पढ़ा न जा सका। बाद में] आंबेडकर ने इसे स्वतंता पुसि्ऋाका के :प में प्रकाशित कर वितरित किया] जो पया़प्त लोकप्रिय हुई।
Section 4 of 'श्रम विभाजन और जाति-प्रथा, मेरी कल्पना का आदर्श समाज' by Dr B.R. Ambedkar. Read the Hindi passage; use Words tab for hard words.
उनके अनुसार समानता] स्वतंताता व बंधाुता ये तीन तटव आदश़ समाज में अनिवाय़तः होने चाहिए] जिससे लोकतंता सामूहिक जीवनचया़ की एक रीति तथा समाज के सम्मिलित अनुभवों के आदान-प्रदान की प्रक्रिया के अथ़ तक भी पहुँचे। यहाँ प्रस्तुत पाठ उक्त पुस्तिका के प्रतिनिधिा प्रकरण हैं। आज के जाति-मजहब आधारित विषाक्त सामाजिक-राजनैतिक माहौल में इनकी प्रासंगिकता और बढ़ गई है। बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर श्रम श्रमश्रम श्रमश्रम विभाजन विभाजनविभाजन विभाजनविभाजन और औरऔर औरऔर जाति-प्रथा जाति-प्रथाजाति-प्रथा जाति-प्रथाजाति-प्रथा यह विडंबना की ही बात है] कि इस युग में भी ^जातिवाद* के पोषाकाें की कमी नहीं हैं। इसके पोषाक कई आधाराें पर इसका समथ़न करते हैं। समथ़न का एक आधार यह कहा जाता है] कि आधाुनिक सभ्य समाज ^काय़-कुशलता* के लिए श्रम विभाजन काे आवश्यक मानता है] और चँूकि जाति-प्रथा भी श्रम विभाजन का ही दूसरा :प है इसलिए इसमें काेई बुराई नहीं है।
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इस तव़फ के संबंधा में पहली बात तो यही आपटिाजनक है] कि जाति-प्रथा श्रम विभाजन के साथ-साथ श्रमिक-विभाजन का भी :प लिए हुए है। श्रम विभाजन] निश्चय ही सभ्य समाज की आवश्यकता है] परंतु किसी भी सभ्य समाज में श्रम विभाजन की व्यवस्था श्रमिकाें का विभिÂ वगोएं में अस्वाभाविक विभाजन नहीं करती। भारत की जाति-प्रथा की एक और विशेषाता यह है कि यह श्रमिकाें का अस्वाभाविक विभाजन ही नहीं करती बल्कि विभाजित विभिÂ वगोएं काे एक-दूसरे की अपेक्षा ऊँच-नीच भी करार देती है] जो कि विश्व के किसी भी समाज में नहीं पाया जाता। जाति-प्रथा काे यदि श्रम विभाजन मान लिया जाए] तो यह स्वाभाविक विभाजन नहीं है] क्योंकि यह मनुष्य की रफचि पर आधारित नहीं है। कुशल व्यक्ति या सक्षम-श्रमिक-समाज का निमा़ण करने के लिए यह आवश्यक है कि हम व्यक्तियों की क्षमता इस सीमा तक विकसित करें] जिससे वह अपना पेशा या काय़ का चुनाव स्वयं कर सके।
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इस सिद्धांत के विपरीत जाति-प्रथा का दूषिात सिद्धांत यह है कि इससे मनुष्य के प्रशिक्षण अथवा उसकी निजी क्षमता का विचार किए बिना] दूसरे ही द्ष्टिकाेण जैसे माता-पिता के सामाजिक स्तर के अनुसार] पहले से ही अथा़त गभ़धारण के समय से ही मनुष्य का पेशा निधा़रित कर दिया जाता है। जाति-प्रथा पेशे का दोषापूण़ पूव़निधा़रण ही नहीं करती बल्कि मनुष्य काे जीवन-भर के लिए एक पेशे में बाँधा भी देती है। भले ही पेशा अनुपयुक्त या अपया़प्त होने के कारण वह भूखों मर जाए।
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आधाुनिक युग में यह स्थिति प्रायः आती है] क्योंकि उ|ोग-धांधाों की प्रक्रिया व तकनीक मंे निरंतर विकास और कभी-कभी अकस्मात परिवत़न हो जाता है] श्रम विभाजन और जाति-प्रथा १२३ जिसके कारण मनुष्य काे अपना पेशा बदलने की आवश्यकता पड़ सकती है और यदि प्रतिकूल परिस्थितियों में भी मनुष्य काे अपना पेशा बदलने की स्वतंताता न हो] तो इसके लिए भूखों मरने के अलावा क्या चारा रह जाता है\ हिंदू धाम़ की जाति प्रथा किसी भी व्यक्ति काे ऐसा पेशा चुनने की अनुमति नहीं देती है] जो उसका पैत्क पेशा न हो] भले ही वह उसमें पारंगत हो। इस प्रकार पेशा परिवत़न की अनुमति न देकर जाति-प्रथा भारत में बेरोजगारी का एक प्रमुख व प्रऋयक्ष कारण बनी हुई है। इस प्रकार हम देखते हैं कि श्रम विभाजन की द्ष्टि से भी जाति-प्रथा गंभीर दोषाों से युक्त है। जाति-प्रथा का श्रम विभाजन मनुष्य की स्वेच्छा पर निभ़र नहीं रहता। मनुष्य की व्यक्तिगत भावना तथा व्यक्तिगत रफचि का इसमें काेई स्थान अथवा महटव नहीं रहता। ^पूव़ लेख* ही इसका आधार है।
Section 8 of 'श्रम विभाजन और जाति-प्रथा, मेरी कल्पना का आदर्श समाज' by Dr B.R. Ambedkar. Read the Hindi passage; use Words tab for hard words.
इस आधार पर हमें यह स्वीकार करना पड़ेगा कि आज के उ|ोगों में गरीबी और उऋपीड़न इतनी बड़ी समस्या नहीं जितनी यह कि बहुत से लोग ^निधा़रित* काय़ काे ^अरफचि* के साथ केवल विवशतावश करते हैं। ऐसी स्थिति स्वभावतः मनुष्य काे दुभा़वना से ग्रस्त रहकर टालू काम करने और कम काम करने के लिए प्रेरित करती है। ऐसी स्थिति में जहाँ काम करने वालों का न दिल लगता हो न दिमाग] काेई कुशलता वैफसे प्राप्त की जा सकती है। अतः यह निवि़वाद :प से सिद्ध हो जाता है कि आथि़क पहलू से भी जाति-प्रथा हानिकारक प्रथा है। क्योंकि यह मनुष्य की स्वाभाविक प्रेरणारफचि व आऋम-शक्ति काे दबा कर उन्हें अस्वाभाविक नियमों में जकड़ कर निष्क्रिय बना देती है। मेरी कल्पना का आदश़-समाज जाति-प्रथा के खेदजनक परिणामों की नीरस गाथा काे सुनते-सुनाते आप में से कुछ लोग निश्चय ही उफब गए होंगे। यह अस्वाभाविक भी नहीं है। अतः अब मैं समस्या के रचनाऋमक पहलू काे लेता हूँ।
Section 9 of 'श्रम विभाजन और जाति-प्रथा, मेरी कल्पना का आदर्श समाज' by Dr B.R. Ambedkar. Read the Hindi passage; use Words tab for hard words.
मेरे }ारा जाति-प्रथा की आलोचना सुनकर आप लोग मुझसे यह प्रश्न पूछना चाहेंगे कि यदि मैं जातियों के वि#द्ध हूँ] तो फिर मेरी द्ष्टि में आदश़-समाज क्या है\ ठीक है] यदि ऐसा पूछेंगे] तो मेरा उटार होगा कि मेरा आदश़-समाज स्वतंताता] समता] भ्रात्ता पर आधारित होगा। क्या यह ठीक नहीं है] भ्रात्ता अथा़त भाईचारे में किसी काे क्या आपटिा हो सकती है\ किसी भी आदश़-समाज में इतनी गातिशीलता होनी चाहिए जिससे काेई भी वांछित परिवत़न समाज के एक छोर से दूसरे तक संचारित हो सके। ऐसे समाज के बहुविधिा हितों में सबका भाग होना चाहिए तथा सबकाे उनकी रक्षा के प्रति सजग रहना चाहिए। सामाजिक जीवन में अबाधा संपव़फ के अनेक साधान व अवसर उपलब्धा रहने चाहिए। ताऋपय़ यह कि दूधा-पानी के मिश्रण की तरह भाईचारे का यही वास्तविक :प है] और इसी १२४ का दूसरा नाम लोकतंता है। क्योंकि लोकतंता केवल शासन की एक पद्धति ही नहीं है] लोकतंता मूलतः सामूहिक जीवनचया़ की एक रीति तथा समाज के सम्मिलित अनुभवों के का भाव हो।
Section 10 of 'श्रम विभाजन और जाति-प्रथा, मेरी कल्पना का आदर्श समाज' by Dr B.R. Ambedkar. Read the Hindi passage; use Words tab for hard words.
इसी प्रकार स्वतंताता पर भी क्या काेई आपटिा हो सकती है\ गमनागमन की स्वाधाीनता] जीवन तथा शारीरिक सुरक्षा की स्वाधाीनता के अथोएं में शायद ही काेई ^स्वतंताता* का विरोधा करे। इसी प्रकार संपटिा के अधिाकार] जीविकाेपाज़न के लिए आवश्यक औजार व सामग्री रखने के अधिाकार जिससे शरीर काे स्वस्थ रखा जा सके] के अथ़ में भी ^स्वतंताता* पर काेई आपटिा नहीं हो सकती। तो फिर मनुष्य की शक्ति के सक्षम एवं प्रभावशाली प्रयोग की भी स्वतंताता क्यों न प्रदान की जाए\ जाति-प्रथा के पोषाक] जीवन] शारीरिक-सुरक्षा तथा संपटिा के अधिाकार की स्वतंताता काे तो स्वीकार कर लेंगे] परंतु मनुष्य के सक्षम एवं प्रभावशाली प्रयोग की स्वतंताता देने के लिए जल्दी तैयार नहीं होंगे] क्योंकि इस प्रकार की स्वतंताता का अथ़ होगा अपना व्यवसाय चुनने की स्वतंताता किसी काे नहीं है] तो उसका अथ़ उसे ^दासता* में जकड़कर रखना होगा] क्योंकि ^दासता* केवल कानूनी पराधाीनता काे ही नहीं कहा जा सकता।
Section 11 of 'श्रम विभाजन और जाति-प्रथा, मेरी कल्पना का आदर्श समाज' by Dr B.R. Ambedkar. Read the Hindi passage; use Words tab for hard words.
^दासता* में वह स्थिति भी सम्मिलित है जिससे कुछ व्यक्तियों काे दूसरे लोगों के }ारा निधा़रित व्यवहार एवं कत़व्यों का पालन करने के लिए विवश होना पड़ता है। यह स्थिति कानूनी पराधाीनता न होने पर भी पाई जा सकती है। उदाहरणाथ़] जाति प्रथा की तरह ऐसे वग़ होना संभव है] जहाँ कुछ लोगों की अपनी इच्छा के वि#द्ध पेशे अपनाने पड़ते हैं। अब आइए समता पर विचार करें। क्या ^समता* पर किसी की आपटिा हो सकती है। प्रफांसीसी व्रफांति के नारे में ^समता* शब्द ही विवाद का विषाय रहा है। ^समता* के आलोचक यह कह सकते हैं कि सभी मनुष्य बराबर नहीं होते। और उनका यह तव़फ वजन भी रखता है। लेकिन तथ्य होते हुए भी यह विशेषा महटव नहीं रखता। क्योंकि शाब्दिक अथ़ में ^समता* असंभव होते हुए भी यह नियामक सिद्धांत है। मनुष्यों की क्षमता तीन बातों पर निभ़र रहती है।
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