CBSE Class 12 · Hindi 1st Language · आरोह भाग 2
शिरीष के फूल
Chapter summary, hard words and model exam answers for CBSE Class 12 Hindi.
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Hazari Prasad Dwivedi
Summary
हजारी प्रसादि}वेदीहजारी प्रसादि}वेदीहजारी प्रसादि}वेदीहजारी प्रसादि}वेदीहजारी प्रसादि}वेदी वितव़फ] कुटज] विचार-प्रवाह] आलोक पव़] प्राचीन भारत के कलाऋमक विनोद(निबंधा-संग्रह)_ बाणभ^ की आऋमकथा] चारफचंद्रलेख] पुनऩवा] अनामदास का पोथा (उपन्यास)_ सूर साहिऋय] कबीर] मधयकालीन बोधा का स्व:प] नाथ संप्रदाय] कालिदास की लालिऋय-योजना] हिंदी साहिऋय का आदकिाल] हिंदी साहिऋय की भूमिका] हिंदी साहिऋयः उद्भव और विकास (आलोचना-साहिऋयेतिहास)_ संदेश रासक] प्थ्वीराजरासो] नाथ-सिद्धों की बानियाँ (ग्रंथ-संपादन)_ विश्व भारती (शांतिनिकेतन) पतिाका का संपादन_ लखनउफ विश्वि|ालय }ारा डी- लिट्म्ऋयु ः सन्१९७९] दिल्ली में मैं साहिऋय काे मनुष्य की द्ष्टि से देखने का पक्षपाती हूँ। जो वाग्जाल मनुष्य काे दुग़ति] हीनता और परमुखापेक्षिता से बचा न सके] जो उसकी आऋमा काे तेजोखीप्त न बना सके] जो उसके त्रदय काे परदुखकातर और संवेदनशील न बना सके] उसे साहिऋय कहने में मुझे संकाेच होता है।
Section 1 of 'शिरीष के फूल' by Hazari Prasad Dwivedi. Read the Hindi passage; use Words tab for hard words.
आचाय़ हजारी प्रसादि}वेदी का साहिऋय कम़ भारतवषा़ के सांस्व्फतिक इतिहास की रचनाऋमक परिणति है। हिंदी] संस्व्फत] प्राव्फत] अपभं्रश] बांग्ला आदि भाषाओं व उनके साहिऋय के साथ इतिहास] संस्व्फति] धाम़] दश़न और आधाुनिक ज्ञान-विज्ञान की व्यापकता व गहनता में पैठ कर उनका अगाधा पाडिंऋय नवीन मानवतावादी सज़ना और आलोचना की क्षमता लेकर प्रकट हुआ है। वे ज्ञान काे बोधा और पांडिऋय की सत्रदयता में ढाल कर एक ऐसा रचना-संसार हमारे सामने उपस्थित करते हैं जो विचार की तेजस्विता] कथन के लालिऋय और बंधा की शास्ताीयता शिरीषा के फूल १११ का संगम है। इस प्रकार उनमें एक साथ कबीर] रवींद्रनाथ व तुलसी एकाकार हो उठते हैं। इसके बाद] उससे जो प्राणधारा फूटती है वह लोकधामी़ रोमैंटिक धारा है] जो उनके उच्च व्फतिऋव काे सहजग्राá बनाए रखती है। उनकी सांस्व्फतिक द्ष्टि जबरदस्त है।
Section 2 of 'शिरीष के फूल' by Hazari Prasad Dwivedi. Read the Hindi passage; use Words tab for hard words.
उसमें इस बात पर विशेषा बल है कि भारतीय संस्व्फति किसी एक जाति की देन नहीं] बल्कि समय-समय पर उपस्थित अनेक जातियों के श्रेष्ठ साधानांशों के लवण-नीर संयोग से उसका विकास हुआ है। उसकी मूल चेतना विराट मानवतावाद है] जिसके संस्पश़ से कला और साहिऋय ही नहीं] यह संपूण़ जीवन ही सौंदय़ व आनंद से परिपूण़ हो उठता है। ि}वेदी जी के सभी उपन्यास समाज के जात-पाँत और मजहबों में विभाजन और आधाी आबादी (स्ताी)के दलन की पीड़ा काे सबसे बड़े सांस्व्फतिक संकट के :प पहचानने] रचने और सामंजस्य में समाधान खोजने का साहिऋय है। वे स्ताी काे सामाजिक अन्याय का सबसे बड़ा शिकार मानते हैं तथा सांस्व्फतिक ऐतिहासिक संदभ़ में उसकी पीड़ा का गहरा विश्लेषाण करते हुए सरस श्रद्धा के साथ उसकी महिमा प्रतिष्ठित करते हैं विशेषाकर बाणभ^ की आऋमकथा में। मानवता और लोक से विमुख काेई भी विज्ञान] तंता-मंता] विश्वास या सिद्धांत से वे मानवतावादी साहिऋयकार व समीक्षक के :प में प्रतिष्ठित हैं।
Section 3 of 'शिरीष के फूल' by Hazari Prasad Dwivedi. Read the Hindi passage; use Words tab for hard words.
ि}वेदी जी का आलोचक व्यक्तिऋव हिंदी-चिंताधारा की सहज लोक-परंपरा काे पहचान लेता है और उसी से संबद्ध नाथों-सिद्धों और कबीर से हिंदी की साहिऋय-परंपरा काे जोड़ कर उसे एक प्रगतिशील मूल्य के :प में प्रतिष्ठित करता है। भक्तिकाल काे भारतीय चिंताधारा का सहज विकास मानने वाले इतिहासकार के :प में उनकी भूमिका ऐतिहासिक महटव रखती है। ि}वेदी जी का निबंधा-साहिऋय इस अथ़ में बड़े महटव का है कि साहिऋय-दश़न तथा समाज-व्यवस्था संबंधाी उनकी कई मौलिक उद्भावनाएँ मूलतः निबंधाों में ही मिलती हैं] पर यह विचार-सामग्री पांडिऋय के बोझ से आक्रांत होने की जगह उसके बोधा से अभिषिाक्त हैं। अपने लेखन }ारा निबंधा-विधा काे सज़नाऋमक साहिऋय की काेटि में ला देने वाले ि}वेदी जी के ये निबंधा व्यक्तिऋव-व्यंजना और आऋमपरक शैली से युक्त हैं। हजारी प्रसादि}वेदी ११२ यहाँ प्रस्तुत ललित निबंधा शिरीषा के फूल लेखक के संग्रह कल्पलता से उद्ध्त है।
Section 4 of 'शिरीष के फूल' by Hazari Prasad Dwivedi. Read the Hindi passage; use Words tab for hard words.
इसमें लेखक आँधाी] लू और गरमी की प्रचंडता में भी अवधाूत की तरह अविचल होकर काेमल पुष्पों का सौंदय़ बिखेर रहे शिरीषा के माधयम से मनुष्य की अजेय जिजीविषा और तुमुल काेलाहल कलह के बीच धौय़पूव़क] लोक के साथ चिंतारत] कऋा़व्यशील बने रहने काे महान मानवीय मूल्य के :प में स्थापित करता है। ऐसी भावधारा में बहते हुए उसे देह-बल के उफपर आऋमबल का महटव सिद्ध करने वाली इतिहास-विभूति गांधाीजी की याद हो आती है तो वह गांधाीवादी मूल्यों के अभाव की पीड़ा से भी कसमसा उठता है। निबंधा की शुरफआत में लेखक शिरीषा पुष्प की काेमल सुंदरता के जाल बुनता है] फिर उसे भेदकर उसके इतिहास में और फिर उसके जरिये मधयकाल के सांस्व्फतिक इतिहास में पैठता है_ फिर तऋकालीन जीवन व सामंती वैभव-विलास काे सावधानी से उकेरते हुए उसका खोखलापन भी उजागर करता है। लेखक अशोक के फूल के भूल जाने की तरह ही शिरीषा काे नजरअंदाज किए जाने की साहिऋयक घटना से आहत है और इसी में उसे सच्चे कवि का तटव-दश़न भी होता है।
Section 5 of 'शिरीष के फूल' by Hazari Prasad Dwivedi. Read the Hindi passage; use Words tab for hard words.
उसके अनुसार योगी की अनासक्त शून्यता और प्रेमी की सरस पूण़ता एक साथ उपलब्धा होना सऋकवि होने की एकमाता शत़ है। ऐसा कवि ही समस्त प्राव्फतिक और मानवीय वैभव में रमकर भी चुकता नहीं और निरंतर आगे बढ़ते जाने की प्रेरणा देता है। शिरीषा के पुराने फलों की अधिाकार-लिप्सु खड़खड़ाहट और नए पटो-फलों }ारा उन्हें धाकियाकर बाहर निकालने में लेखक साहिऋय] समाज व राजनीति में पुरानी और नयी पीढ़ी के }ं} काे संकेतित करता है तथा स्पष्ट :प से पुरानी पीढ़ी और हम सब मंे नयेपन के स्वागत का साहस देखना चाहता है। इस निबंधा का शिल्प इसी में चचि़त इक्षुदंड की तरह है सांस्व्फतिक संदभोएं व शब्दावली की भड़कीली खोल के भीतर सहज भावधारा के मधाुरस से युक्त। यह हर तरह से आस्वाद्य और प्रयोजनीय है तथा इस प्रकार लेखक के प्रतिनिधिा निबंधाों में से एक है। शिरीषा के शिरीषा के शिरीषा के शिरीषा के शिरीषा के फिफ फफूूूल लल लल जहाँ बैठ के यह लेख लिख रहा हूँ उसके आगे-पीछे] दाएँ-बाएँ] शिरीषा के अनेक पेड़ हैं।
Section 6 of 'शिरीष के फूल' by Hazari Prasad Dwivedi. Read the Hindi passage; use Words tab for hard words.
जेठ की जलती धाूप में] जबकि धारिताी निधा़ूम अग्निकुंड बनी हुई थी] शिरीषा नीचे से उफपर तक फूलों से लद गया था। कम फूल इस प्रकार की गरमी में फूल सकने की हिम्मत करते हैं। कणि़कार और आरग्वधा (अमलतास) की बात मैं भूल नहीं रहा हूँ। वे भी आस पास बहुत हैं। लेकिन शिरीषा के साथ आरग्वधा की तुलना नहीं की जा सकती। वह पद्रंह-बीस दिन के लिए फूलता है] वसंत ऋतु के पलाश की भाँति। कबीरदास काे इस तरह पद्रंह दिन के लिए लहक उठना पसंद नहीं था। यह भी क्या कि दस दिन फूले और फिर खंखड़-के-खंखड़ ^दिन दस फूला फूलिके खंखड़ भया पलास!* ऐसे दुमदाराें से तो लँडूरे भले। फूल है शिरीषा। वसंत के आगमन के साथ लहक उठता है] आषाढ़ तक जो निश्चित :प से मस्त बना रहता है। मन रम गया तो भरे भादों में भी निघा़त फूलता रहता है। जब उमस से प्राण उबलता रहता है और लू से त्रदय सूखता रहता है] एकमाता शिरीषा कालजयी अवधाूत की भाँति जीवन की अजेयता का मंता प्रचार करता रहता है।
Section 7 of 'शिरीष के फूल' by Hazari Prasad Dwivedi. Read the Hindi passage; use Words tab for hard words.
य|पि कवियों की भाँति हर फूल-पटो काे देखकर मुग्धा होने लायक त्रदय विधाता ने नहीं दिया है] पर नितांत ठूँठ भी नहीं हूँ। शिरीषा के पुष्प मेरे मानस में थोड़ा हिल्लोल ज:र पैदा करते हैं। शिरीषा के व्क्ष बड़े और छायादार होते हैं। पुराने भारत का रईस जिन मंगल-जनक व्क्षों काे अपनी व्क्ष-वाटिका की चहारदीवारी के पास लगाया करता था] उनमें एक शिरीषा भी है। (व्हतसंहिता ५५]१३) अशोक] अरिष्ट] पुन्नाग और शिरीषा के छायादार और घनमस्ण हरीतिमा से परिवेष्टित व्क्ष वाटिका ज:र बड़ी मनोहर दिखती होगी। वाऋस्यायन ने ^कामसूता* में बताया है कि वाटिका के सघन छायादार व्क्षों की छाया में ही झूला(प्रेंखा दोला) लगाया जाना चाहिए। य|पि पुराने कवि बकुल के पेड़ में ऐसी दोलाओं काे लगा देखना चाहते थे] पर शिरीषा भी क्या बुरा है! डाल इसकी अपेक्षाव्फत कमजोर ज:र होती है] पर उसमें झूलनेवालियों का वजन भी तो बहुत जयादा नहीं होता। कवियों की यही तो बुरी आदत है कि वजन का एकदम खयाल नहीं करते।
Section 8 of 'शिरीष के फूल' by Hazari Prasad Dwivedi. Read the Hindi passage; use Words tab for hard words.
मैं तुंदिल नरपतियों की बात नहीं कह रहा हूँ] वे चाहें तो लोहे का पेड़ बनवा लें। ११४ शिरीषा का फूल संस्व्फत-साहिऋय में बहुत काेमल माना गया है। मेरा अनुमान है कि कालिदास ने यह बात शु:-शु: में प्रचार की होगी। उनका इस पुष्प पर कुछ पक्षपात था (मेरा भी है)। कह गए हैं] शिरीषा पुष्प केवल भौंरों के पदों का काेमल दबाव सहन कर सकता है] पक्षियों का बिलकुल नहीं ^पदं सहेत भ्रमरस्य पेलवं शिरीषा पुष्पं न पुनः पततिाणाम्।* अब मैं इतने बड़े कवि की बात का विरोधा वैफसे क:ँ\ सिप़फ विरोधा करने की हिम्मत न होती तो भी कुछ कम बुरा नहीं था] यहाँ तो इच्छा भी नहीं है। खैर] मैं दूसरी बात कह रहा था। शिरीषा के शिरीषा के फूल ११५ फूलों की काेमलता देखकर परवती़ कवियों ने समझा कि उसका सब-कुछ काेमल है! यह भूल है। इसके फल इतने मजबूत होते हैं कि नए फूलों के निकल आने पर भी स्थान नहीं छोड़ते। जब तक नए फल-पटो मिलकर] धाकियाकर उन्हें बाहर नहीं कर देते तब तक वे डटे रहते हैं।
Section 9 of 'शिरीष के फूल' by Hazari Prasad Dwivedi. Read the Hindi passage; use Words tab for hard words.
वसंत के आगमन के समय जब सारी वनस्थली पुष्प-पता से मम़रित होती रहती है] शिरीषा के पुराने फल बुरी तरह खड़खड़ाते रहते हैं। मुझे इनकाे देखकर उन नेताओं की बात याद आती है] जो किसी प्रकार जमाने का रफख नहीं पहचानते और जब तक नयी पौधा के लोग उन्हें धाक्का मारकर निकाल नहीं देते तब तक जमे रहते हैं। मैं सोचता हूँ कि पुराने की यह अधिाकार-लिप्सा क्यों नहीं समय रहते सावधान हो जाती\ जरा और म्ऋयु] ये दोनों ही जगत के अतिपरिचित और अतिप्रामाणिक सऋय हैं। तुलसीदास ने अप़्ाफसोस के साथ इनकी सच्चाई पर मुहर लगाई थी ^धारा काे प्रमान यही तुलसी जो फरा सो झरा] जो बरा सो बुताना!* मैं शिरीषा के फूलों काे देखकर कहता हूँ कि क्यों नहीं फलते ही समझ लेते बाबा कि झड़ना निश्चित है! सुनता काैन हैं\ महाकालदेवता सपासप काेड़े चला रहे हैं] जीण़ और दुब़ल झड़ रहे हैं] जिनमें प्राणकण थोड़ा भी उफधव़मुखी है] वे टिक जाते हैं। दुरंत प्राणधारा और सव़व्यापक कालाग्नि का संघषा़ निरंतर चल रहा है।
Section 10 of 'शिरीष के फूल' by Hazari Prasad Dwivedi. Read the Hindi passage; use Words tab for hard words.
मूख़ समझते हैं कि जहाँ बने हैं] वहीं देर तक बने रहें तो कालदेवता की आँख बचा जाएँगे। भोले हैं वे। हिलते-डुलते रहो] स्थान बदलते रहो] आगे की ओर मुँह किए रहो तो काेड़े की मार से बच भी सकते हो। जमे कि मरे! एक-एक बार मुझे मालूम होता है कि यह शिरीषा एक अद्भुत अवधाूत है। दुःख हो या सुख] वह हार नहीं मानता। न उफधाो का लेना] न माधाो का देना। जब धारती और आसमान जलते रहते हैं] तब भी यह हजरत न जाने कहाँ से अपना रस खींचते रहते हैं। मौज में आठों याम मस्त रहते हैं। एक वनस्पतिशास्ताी ने मुझे बताया है कि यह उस श्रेणी का पेड़ है जो वायुमंडल से अपना रस खींचता है। ज:र खींचता होगा। नहीं तो भयंकर लू के समय इतने काेमल तंतुजाल और ऐसे सुकुमार केसर काे वैफसे उगा सकता था\ अवधाूतों के मुँह से ही संसार की सबसे सरस रचनाएँ निकली हैं। कबीर बहुत-कुछ इस शिरीषा के समान ही थे] मस्त और बेपरवा] पर सरस और मादक। कालिदास भी ज:र अनासक्त योगी रहे होंगे।
Section 11 of 'शिरीष के फूल' by Hazari Prasad Dwivedi. Read the Hindi passage; use Words tab for hard words.
शिरीषा के फूल फक्कड़ाना मस्ती से ही उपज सकते हैं और ^मेघदूत* का काव्य उसी प्रकार के अनासक्त अनाविल उन्मुक्त त्रदय में उमड़ सकता है। जो कवि अनासक्त नहीं रह सका] जो फक्कड़ नहीं बन सका] जो किए-कराए का लेखा-जोखा मिलाने में उलझ गया] वह भी क्या कवि है\ कहते हैं कणा़ट-राज की प्रिया विज्जिका देवी ने गव़पूव़क कहा था कि एक कवि ब्रंा थे] दूसरे वाल्मीकि और तीसरे व्यास। एक ने वेदों काे दिया] दूसरे ने रामायण काे और तीसरे ने महाभारत काे। इनके अतिरिक्त और काेई यदि कवि होने का दावा करे तो मैं ११६ कणा़ट-राज की प्यारी रानी उनके सिर पर अपना बायाँ चरण रखती हूँ ^तेषां मूघ्नि़ ददामि वामचरणं कणा़ट-राजप्रिया!* मैं जानता हूँ कि इस उपालंभ से दुनिया का काेई कवि हारा नहीं है] पर इसका मतलब यह नहीं कि काेई लजाया नहीं तो उसे डाँटा भी न जाए। पर मैं कहता हूँ कवि बनना है मेरे दोस्तो] तो फक्कड़ बनो। शिरीषा की मस्ती की ओर देखो। लेकिन अनुभव ने मुझे बताया है कि काेई किसी की सुनता नहीं। मरने दो!
Section 12 of 'शिरीष के फूल' by Hazari Prasad Dwivedi. Read the Hindi passage; use Words tab for hard words.
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