CBSE Class 12 · Hindi 1st Language · आरोह भाग 2
कवितावली (उत्तरकांड), लक्ष्मण-मूर्छा और राम का विलाप
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Goswami Tulsidas
Summary
गोस्वामी तुलसीदासगोस्वामी तुलसीदासगोस्वामी तुलसीदासगोस्वामी तुलसीदासगोस्वामी तुलसीदास में माना जाता है गीतावली] दोहावली] कवितावली] रामाज्ञा-प्रश्न निद्नः सन्१६२३] काशी में त्रदय-सिंधाु मति सीप समाना। स्वाती सारद कहहिं सुजाना।। जौं बरष्ौ बर बारि विचा:। होहिं कबित मुकुतामनी चा:।। कीरति भनिति भूति भल सोई। सुरसरि सम सब कहँ हित होई।। भक्तिकाल की सगुण काव्य-धारा में रामभक्ति शाखा के सवो़परि कवि गोस्वामी तुलसीदास में भक्ति से कविता बनाने की प्रव्रिफया की सहज परिणति है। परंतु उनकी भक्ति इस हद तक लोकाेन्मुख है कि वे लोकमंगल की साधाना के कवि के :प में प्रतिष्ठित हैं। यह बात न सिप़्ा़फ उनकी काव्य-संवेदना की द्ष्टि से] वरन्काव्यभाषा के घटकाें की द्ष्टि से भी सऋय है। इसका सबसे प्रकट प्रमाण तो यही है कि शास्ताीय भाषा (संस्व्फत) में सज़न-क्षमता होने के बावजूद उन्होंने लोकभाषा (अवधाी व ब्रजभाषा) काे साहिऋय-रचना के माधयम के :प में चुना और बुना।
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जिस प्रकार उनमें भक्त और रचनाकार का }ं} है] उसी प्रकार शास्ता व लोक का }ं} है_ जिसमें संवेदना की द्ष्टि से लोक की ओर वे झुके हैं तो शिल्पगत मया़दा की द्ष्टि से शास्ता की ओर। शास्ताीयता काे लोकग्राá तथा लोकग्हीत काे शास्ताीय बनाने की उभयमुखी प्रव्रिफया उनके यहाँ चलती है। यह तटव उन्हें वि}ानों तथा जनसामान्य में समान :प से लोकप्रिय बनाता है। उनकी एक अनन्य विशेषाता है कि वे दाश़निक और लौकिक स्तर के नाना }ं}ों के चिताण और उनके समन्वय के कवि हैं। ^}ं}-चिताण* जहाँ सभी विचार@भावधारा के लोगों काे तुलसी-काव्य में अपनी-अपनी उपस्थिति का संतोषा देता है] वहीं ^समन्वय* उनकी उफपरी विभिन्नता में निहित एक ही मानवीय सूता काे उपलब्धा करा के संसार में एकता व शांति का माग़ प्रशस्त करता है। कवितावली और रामचरितमानस से तुलसीदास की लोक व शास्ता दोनों में गहरी पैठ है तथा जीवन व जगत की व्यापक अनुभूति और मामि़क प्रसंगों की उन्हें अचूक समझ है।
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यह विशेषाता उन्हें महाकवि बनाती है और इसी से प्रव्फति व जीवन के विविधा भावपूण़ चिताों से उनका रचना संसार सम्द्ध है] विशेषाकर ^रामचरितमानस*। इसी से यह हिंदी का अि}तीय महाकाव्य बनकर उभरा है। इसकी विश्वप्रसिद्ध लोकप्रियता के पीछे सीताराम कथा से अधिाक लोक-संवेदना और समाज की नैतिक बनावट की समझ है। उनके सीता-राम ईश्वर की अपेक्षा तुलसी के देश काल के आदशोएं के अनु:प मानवीय धारातल पर पुनः स्ष्ट चरिता हैं। गोस्वामी जी ग्रामीण व व्फषाक संस्व्फति तथा रक्त संबंधा की मया़दा पर आदशी़व्फत ग्हस्थ जीवन के चितेरे कवि हैं। तुलसीदास इस अथ़ में हिंदी के जातीय कवि हैं कि अपने समय में हिंदी-क्षेता में प्रचलित सारे भावाऋमक व काव्यभाषायी तटवोें का प्रतिनिधिाऋव वे करते हैं। इस संदभ़ में भाव] विचार] काव्य-:प] छंद और काव्यभाषा की जो बहुल सम्द्धि उनमें दिखती है वह अि}तीय है।
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तऋकालीन हिंदी-क्षेता की दोनों काव्य भाषाओं अवधाी व ब्रजभाषा तथा दोनों संस्व्फति कथाओं सीताराम व राधाव्फष्ण की कथाओं काे साधिाकार अपनी अभिव्यक्ति का माधयम बनाते हैं। उपमा अलंकार के क्षेता में जो प्रयोग-वैशिष्ट्य कालिदास की पहचान है] वही पहचान सांग:पक के क्षेता में तुलसीदास की है। विविधा विषामताओं से ग्रस्त कलिकाल तुलसी का युगीन यथाथ़ है] जिसमें वे व्फपालु प्रभु राम व रामराज्य का स्वप्न रचते हैं। युग और उसमें अपने जीवन का न सिप़्ा़फ उन्हें गहरा बोधा है] बल्कि उसकी अभिव्यक्ति में भी वे अपने समकालीन कवियों से आगे हैं। यहाँ पाठ में प्रस्तुत ^कवितावली* के दो कविटा और एक सवैया इसके प्रमाणस्व:प हैं। पहले छंद (“किसबी किसान…, )में उन्होंने दिखलाया है कि संसार के अच्छे-बुरे समस्त लीला-प्रपंचों का आधार ^पेट की आग* का दा#ण व गहन यथाथ़ है_ जिसका समाधान वे राम-:पी घनश्याम (मेघ) के व्फपा-जल में देखते हैं।
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इस प्रकार] उनकी राम-भक्ति पेट की आग बुझाने वाली यानी जीवन के यथाथ़ संकटों का समाधान करने वाली है_ साथ ही जीवन-बाá आधयािऋमक मुक्ति देने वाली भी। दूसरे छंद (“खेती न किसान…,) में प्रव्फति और शासन की विषामता से उपजी बेकारी व गरीबी की पीड़ा का यथाथ़परक चिताण करते हुए उसे दशानन (रावण) से उपमित करते हैं। तीसरे छंद (“धाूत कहौ…,) में भक्ति की गहनता और सघनता में उपजे भक्त-त्रदय के आऋमविश्वास का सजीव चिताण है] जिससे समाज में व्याप्त जात-पाँत और धाम़ के विभेदक दुराग्रहों के तिरस्कार का साहस पैदा होता है। इस प्रकार भक्ति की रचनाऋमक भूमिका का संकेत यहाँ है] जो आज के भेदभावमूलक सामाजिक-राजनीतिक माहौल में अधिाक प्रासंगिक है। ^रामचरितमानस* के लंका कांड से ग्हीत ल{मण के शक्ति बाण लगने का प्रसंग कवि की मामि़क स्थलों की पहचान का एक श्रेष्ठ नमूना है। भाई के शोक में विगलित राम का विलाप धाीरे-धाीरे प्रलाप में बदल जाता है] जिसमें ल{मण के प्रति राम के अंतर में छिपे प्रेम के कई काेण सहसा अनाव्त हो जाते हैं।
Section 5 of 'कवितावली (उत्तरकांड), लक्ष्मण-मूर्छा और राम का विलाप' by Goswami Tulsidas. Read the Hindi passage; use Words tab for hard words.
यह प्रसंग ईश्वरीय राम का पूरी तरह से मानवीकरण कर देता है] जिससे पाठक गोस्वामी तुलसीदास का काव्य-मम़ से सीधो जुड़ाव हो जाता है और वह भक्त तुलसी के भीतर से कवि तुलसी के उभर आने और पूरे प्रसंग पर उसके छा जाने की अनुभूति करता है। इस घने शोक-परिवेश में हनुमान का संजीवनी लेकर आ जाना कवि काे क#ण रस के बीच वीर रस के उदय के :प में दिखता है। यह उपमा अद्भुत है और काव्यगत क#ण-प्रसंग काे जीवन के मंगल-विकास की ओर ले जाती है। कवितावली कवितावली कवितावली कवितावली कवितावली (उ उउउउट टट टटार कांड सेार कांड सेार कांड सेार कांड सेार कांड से ) किसबी] किसान-कुल] बनिक] भिखारी] भाट] चाकर] चपल नट] चोर] चार ] चेटकी। पेटकाे पढ़त] गुन गढ़त] चढ़त गिरि] अटत गहन-गन अहन अखेटकी।। ऊँचे-नीचे करम] धारम-अधारम करि] पेट ही काे पचत] बेचत बेटा-बेटकी। ^तुलसी* बुझाइ एक राम घनस्याम ही तें] आगि बड़वागितें बड़ी है आगि पेटकी।। खेती न किसान काे] भिखारी काे न भीख] बलि] बनिक काे बनिज] न चाकर काे चाकरी।
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जीविका बिहीन लोग सी|मान सोच बस] कहैं एक एकन सों ^कहाँ जाई] का करी\* बेदहूँ पुरान कही] लोकहूँ बिलोकिअत] साँकरे सबैं पै] राम! रावरें व्फपा करी। दारिद-दसानन दबाई दुनी] दीनबंधाु! दुरित-दहन देखि तुलसी हहा करी।। धाूत कहौ] अवधाूऋा कहौ] रजपूतु कहौ] जोलहा कहौ काेउफ। काहू की बेटीसों बेटा न ब्याहब] काहूकी जाति बिगार न सोउफ।। तुलसी सरनाम गुलामु है राम काे] जाकाे रफचै सो कहै कछु ओउफ। माँगि वैफ खैबो] मसीत काे सोइबो] लैबोकाे एकु न दैबकाे दोऊ। ल{मण-मूच्छा़ और राम का विलापल{मण-मूच्छा़ और राम का विलापल{मण-मूच्छा़ और राम का विलापल{मण-मूच्छा़ और राम का विलापल{मण-मूच्छा़ और राम का विलाप दोहा तव प्रताप उर राखि प्रभु जैहउँ नाथ तुरंत। अस कहि आयसु पाइ पद बंदि चलेउ हनुमंत।। भरत बाहु बल सील गुन प्रभु पद प्रीति अपार। मन महुँ जात सराहत पुनि पुनि पवनकुमार।। उहाँ राम लछिमनहि निहारी। बोले बचन मनुज अनुसारी।। अधा़ राति गइ कपि नहिं आयउ। राम उठाइ अनुज उर लायउफ।। सकहु न दुखित देखि मोहि काउफ।
Section 7 of 'कवितावली (उत्तरकांड), लक्ष्मण-मूर्छा और राम का विलाप' by Goswami Tulsidas. Read the Hindi passage; use Words tab for hard words.
बंधाु सदा तव म्दुल सुभाउफ।। मम हित लागि तजेहु पितु माता। सहेहु बिपिन हिम आतप बाता।। कवितावली @ ल{मण-मूच्छा़… सो अनुराग कहाँ अब भाई। उठहु न सुनि मम बच बिकलाई।। जौं जनतेउँ बन बंधाु बिछोहू। पितु बचन मनतेउँ नहिं ओहू।। सुत बित नारि भवन परिवारा। होहिं जाहिं जग बारहिं बारा।। अस बिचारि जियँ जागहु ताता। मिलइ न जगत सहोदर भ्राता।। जथा पंख बिनु खग अति दीना। मनि बिनु फनि करिबर कर हीना।। अस मम जिवन बंधाु बिनु तोही। जौं जड़ दैव जिआवै मोही।। जैहउँ अवधा कवन मुहुँ लाई। नारि हेतु प्रिय भाइ गँवाई।। बरफ अपजस सहतेउँ जग माहीं। नारि हानि बिसेषा छति नाहीं।। अब अपलोकु सोकु सुत तोरा। सहिहि निठुर कठोर उर मोरा।। निज जननी के एक कुमारा। तात तासु तुम्ह प्रान अधारा। सांैपेसि मोहि तुम्हि गहि पानी। सब बिधिा सुखद परम हित जानी।। उतरफ काह दैहउँ तेहि जाई। उठि किन मोहि सिखावहु भाई।। बहु बिधिा सोचत सोच बिमोचन। स्रवत सलिल राजिव दल लोचन।। सोरठा प्रभु प्रलाप सुनि कान बिकल भए बानर निकर आइ गयउ हनुमान जिमि करफना मँह बीर रस।।
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हरषिा राम भेटेउ हनुमाना। अति व्फतग्य प्रभु परम सुजाना।। तुरत बैद तब कीन्हि उपाई। उठि बैठे लछिमन हरषाई।। त्रदयँ लाइ प्रभु भेंटेउ भ्राता। हरष्ो सकल भालु कपि ब्राता।। कपि पुनि बैद तहाँ पहुँचावा। जेहि बिधिा तबहिं ताहि लइ आवा।। यह ब्तांत दसानन सुनेउफ। अति बिषाद पुनि पुनि सिर धाुनेउफ।। ब्याकुल कुंभकरन पहिं आवा। बिबिद्जतन करि ताहि जगावा।। जागा निसिचर देखिअ वैफसा। मानहुँ कालु देह द्रि बैसा।। वुंफभकरन बूझा कहु भाई। काहे तव मुख रहे सुखाई।। कथा कही सब तेहिं अभिमानी। जेहि प्रकार सीता हरि आनी।। तात कपिन्ह सब निसिचर मारे। महा महा जोधा संघारे।। दुम़ुख सुररिपु मनुज अहारी। भट अतिकाय अकंपन भारी।। अपर महोदर आदकि बीरा । परे समर महि सब रनधाीरा।। दोहा सुनि दसकंधार बचन तब कुंभकरन बिलखान। जगदंबा हरि आनि अब सठ चाहत कल्यान।। अभ्यास पाठ के साथ १- कवितावली में उद्ध्त छंदों के आधार पर स्पष्ट करें कि तुलसीदास काे अपने युग की आथि़क विषामता की अच्छी समझ है।
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२- पेट की आग का शमन ईश्वर (राम) भक्ति का मेघ ही कर सकता है तुलसी का यह काव्य-सऋय क्या इस समय का भी युग-सऋय है\ तव़फसंगत उटार दीजिए। ३- तुलसी ने यह कहने की ज:रत क्यों समझी\ धाूत कहौ] अवधाूत कहौ] रजपूतु कहौ] जोलहा कहौ काेउफ @ काहू कुी बेटीसों बेटा न ब्याहब] काहूकी जाति बिगार न सोउफ। इस सवैया में काहू के बेटासों बेटी न ब्याहब कहते तो सामाजिक अथ़ में क्या परिवत़न आता\ ४- धाूत कहौ… वाले छंद में उफपर से सरल व निरीह दिखलाई पड़ने वाले तुलसी की भीतरी असलियत एक स्वाभिमानी भक्त त्रदय की है। इससे आप कहाँ तक सहमत हैं\ ५- व्याख्या करें (क) मम हित लागि तजेहु पितु माता। सहेहु बिपिन हिम आतप बाता। जौं जनतेउँ बन बंधाु बिछोहू। पितु बचन मनतेउँ नहिं ओहू।। (ख) जथा पंख बिनु खग अति दीना। मनि बिनु फनि करिबर कर हीना। अस मम जिवन बंधाु बिनु तोही। जौं जड़ दैव जिआवै मोही।। (ग) माँगि वैफ खैबो] मसीत काे सोइबो] लैबोकाे एकु न दैबकाे दोउफ।। (घ) उफँचे नीचे करम] धारम-अधारम करि] पेट ही काे पचत] बेचत बेटा-बेटकी।।
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६- भ्रात्शोक में हुई राम की दशा काे कवि ने प्रभु की नर लीला की अपेक्षा सच्ची मानवीय अनुभूति के :प मंे रचा है। क्या आप इससे सहमत हैं\ तव़फपूण़ उटार दीजिए। ७- शोकग्रस्त माहौल में हनुमान के अवतरण काे क#ण रस के बीच वीर रस का आविभा़व क्यों कहा गया है\ ८- जैहउँ अवधा कवन मुहुँ लाई। नारि हेतु प्रिय भाइ गँवाई।। ब# अपजस सहतेउँ जग माहीं। नारि हानि बिसेषा छति नाहीं।। भाई के शोक में डूबे राम के इस प्रलाप-वचन में स्ताी के प्रति वैफसा सामाजिक द्ष्टिकाेण संभावित है\ कवितावली @ ल{मण-मूच्छा़… पाठ के आसपास १- कालिदास के रघुवंश महाकाव्य में पऋनी (इंदुमती) के म्ऋयु-शोक पर अज तथा निराला की सरोज-स्म्ति में पुताी (सरोज) के म्ऋयु-शोक पर पिता के क#ण उद्गार निकले हैं। उनसे भ्रात्शोक में डूबे राम के इस विलाप की तुलना करें। २- पेट ही कुो पचत] बेचत बेटा-बेटकी तुलसी के युग का ही नहीं आज के युग का भी सऋय है।
Section 11 of 'कवितावली (उत्तरकांड), लक्ष्मण-मूर्छा और राम का विलाप' by Goswami Tulsidas. Read the Hindi passage; use Words tab for hard words.
भुखमरी में किसानों की आऋमहऋया और संतानों (खासकर बेटियों) काे भी बेच डालने की त्रदय-विदारक घटनाएँ हमारे देश में घटती रही हैं। वत़मान परिस्थितियों और तुलसी के युग की तुलना करें। ३- तुलसी के युग की बेकारी के क्या कारण हो सकते हैं\ आज की बेकारी की समस्या के कारणों के साथ उसे मिलाकर कक्षा में परिचचा़ करें। ४- राम काैशल्या के पुता थे और ल{मण सुमिता के। इस प्रकार वे परस्पर सहोदर (एक ही माँ के भ्राता,\ इस पर विचार करें। ५- यहाँ कवि तुलसी के दोहा] चौपाई] सोरठा] कविटा] सवैया ये पाँच छंद प्रयुक्त हैं। इसी प्रकार तुलसी साहिऋय में और छंद तथा काव्य-:प आए हैं। ऐसे छंदों व काव्य-:पों की सूची बनाएँ।
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