CBSE Class 12 · Hindi 1st Language · वितान भाग 2
जूझ
Chapter summary, hard words and model exam answers for CBSE Class 12 Hindi.
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Anand Yadav
Summary
पाठशाला जाने के लिए मन तड़पता था। लेकिन दादा के सामने खड़े होकर यह कहने की हिम्मत नहीं होती कि] “मैं पढ़ने जाऊँगा।, डर लगता था कि हंी-पसली एक कर देगा। इसलिए मैं इस ताक में रहता कि काेई दादा काे लगेगा। जो बाबा के समय था] वह दादा के समय नहीं रहा। यह खेती हमें गइे में धाकेल रही है। पढ़ जाऊँगा तो नौकरी लग जाएगी] चार पैसे हाथ में रहेंगे] विठोबा आ.णा की तरह कुछ धांधा कारोबार किया जा सकेगा।* अंदर-ही-अंदर इस तरह के विचार चलते रहते। दीवाली बीत जाने पर महीना-भर ईख पेरने का काेल्हू चलाना होता। काेल्हू जरा जल्दी शु: किया तो दादा की समझ से ईख की अच्छी-खासी कीमत मिल जाती। यह उसकी समझ कुछ हद तक सही थी। जब चाराें ओर काेल्हू चलने लगते तो बाजार में गुड़ की बहुतायत हो जाती और भाव नीचे उतर आते। उस समय नंबर एक और नंबर दो का गुड़ बहुत आता और हमारे जैसे खेतों पर ही बनाए गए नंबर तीन के गुड़ काे काैन पूछता। बाकी के किसान दूसरे ढंग से विचार करते थे।
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उनका मत था कि यदि ईख काे और कुछ दिन खेत में खड़ी रहने दिया गया तो गुड़ जरा जयादा निकलता है। देर तक खड़ी रहने वाली ईख के रस में पानी की माता कम होती है और रस गाढ़ा हो जाता है जिसके कारण जयादा गुड़ निकलता है। लेकिन दादा की समझ से गुड़ जयादा निकलने की अपेक्षा भाव जयादा मिलना चाहिए। इसलिए सारे गाँव भर में हमारा काेल्हू सबसे पहले शु: होता था। जूझ आनंद यादव माँ ने कहा] “अब तू ही बता] मैं का क:ँ\, पढ़ने-लिखने की बात की तो वह बरहेला सूअर की तरह गुरा़ता है। तुझे मालूम है।,…माँ के मन में जंगली सूअर बहुत गहराई में बैठा हुआ था। “अब म›ा (खेती) के सभी काम बीत गए हैं। मेरे लिए अब कुछ तो करना नहीं रह गया है। इसलिए कहता हूँ_ तू दटा जी राव सरकार से मेरे पढ़ने के बारे में कह। आज ही रात काे उनके यहाँ चलेंगे। मैं चलूँगा तेरे साथ। तू उन्हें सब कुछ समझाकर बता दे। तो वे दादा काे ठीक तरह से समझा सवेंफगे।, इसी कारण वह इस वषा़ भी शु: हुआ और हम उससे जल्दी निपट गए। आगे के काम में लग गए। सभी जन धाूप में लेटे हुए थे।
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माँ धाूप में कंडे थाप रही थी मैं बाल्टी में पानी भर-भरकर उसे दे रहा था। कुछ-न-कुछ बातचीत भी कर रहे थे। हम दोनों ही थे इसलिए यह सोचकर कि बात माँ से कहनी चाहिए और मैंने अपने पढ़ने की बात छेड़ दी। जूझ “ठीक है चलेंगे।, माँ ने हाँ तो की लेकिन अंदर से माँ के स्वर में उदासी थी। मुझे भी मालूम था कि इतना करने पर भी काेई लाभ नहीं होगा। लेकिन वह मेरा मन रखने के लिए जाने काे तैयार हो गई। मेरी तड़पन वह समझती थी। सातवीं तक पढ़ाने की उसके मन में तैयारी थी। लेकिन दादा के आगे उसका बस नहीं चलता था। रात काे मैं और माँ दटा जी राव देसाई के यहाँ गए। माँ ने दीवार के सहारे बैठकर दटा जी राव से सब कुछ कह दिया। वे भी इस बात से सहमत हो गए। माँ ने यह भी बताया कि दादा सारे दिन बाजार में रखमाबाई के पास गुजार देता है। खेती के काम में हाथ नहीं लगाता है। माँ ने देसाई काे यह विश्वास दिला दिया कि दादा काे सारे गाँव भर आजादी के साथ घूमने काे मिलता रहे] इसलिए उसने मेरा पढ़ना बंद कर मुझे खेती में जोत दिया है।
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यह सुनते ही देसाई दादा चिढ़ गए और बोले] “आने दे अब उसे] मैं उसे सुनाता हूँ कि नहीं अच्छी तरह] देख।, उठते-उठते मैंने भी दटा जी राव से कहा] “अब जनवरी का महीना है। अब परीक्षा नजदीक आ गई है। मैं यदि अभी भी कक्षा में जाकर बैठ गया और पढ़ाई की दुहराई कर ली तो दो महीने में पाँचवीं की सारी तैयारी हो जाएगी और मैं परीक्षा में पास हो जाऊँगा। इस तरह मेरा साल बच जाएगा। अब खेती में ऐसा कुछ काम नहीं है। मेरा पहले ही एक वषा़ बेकार में चला गया है।, “ठीक है] ठीक है। अब तुम दोनों अपने घर जाओ जब वह आ जाए तो मेरे पास भेज देना और उसके पीछे से घड़ी भर बाद में तू भी आ जाना रे छोरा।, “जी!, कहकर हम खड़े हो गए। उठते-उठते हमने यह भी कहा कि “हमने यहाँ आकर ये सभी बातें कही हैं] यह मत बता देना] नहीं तो हम दोनों की खैर नहीं है। माँ अकेली साग-भाजी देने आई थी। यह बता देंगे तो अच्छा होगा।, “ठीक है] ठीक है। मुझे जो करना है मैं क:ँगा। देख] उसके सामने ही तुझसे कुछ पूछूँगा तो निडर होकर साप़्ाफ-साप़् फ उटार देना।
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डरना मत।, “नहीं जी।, मैं माँ के साथ लौट आया। एक घंटा रात बीते दादा घर पर आया। मैं घर में ही था। आते ही माँ ने दादा से कहा] “साग-भाजी देने देसाई सरकार के यहाँ गई थी तो उन्होंने कहा कि बहुत दिनों से तेरा मालिक दिखाई नहीं दिया है। खेत से आ जाने पर जरा इधार भेज देना।, “कुछ काम-वाम था\, दादा ने अधाीरता से पूछा। “मुझे तो कुछ बताया नहीं उन्होंने।, “तो मैं हो आता हूँ। तब तक तू रोटियाँ सेंक ले। गणपा आए तो उसे खेतों पर भेज देना पहले ही।, आधा घंटा बीतने पर माँ ने मुझसे कहा कि “अब तू जा] कहना जीमने१ बुलाया है।, “अच्छा।, मैं पहुँचा तो सरकार मेरी राह देख रहे थे। “क्यों आया रे छोरे\, “दादा काे बुलाने आया हूँ] अभी खाना नहीं खाया है।, “बैठ] बैठ थोड़ी देर। अभी तो आया है वह मेरे पास।, “जी], मैं बैठ गया। धाीरे-धाीरे दटा जी राव पूछने लगे] “काैन-सी में पढ़ता है रे तू\, “जी] पाँचवीं में था किंतु अब नहीं जाता हूँ।, “क्यों रे\, “दादा ने मना कर दिया है।
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खेतों में पानी लगाने वाला काेई नहीं है।, “क्यों रतनाप्पा\, “हाँ जी!, “फिर तू क्या करता है\, सरकार ने दादा से जिरह करना शु: किया तो सारा इतिहास बाहर निकल आया। सरकार ने दादा पर खूब गुस्सा किया। उन्होंने दादा की खूब हजामत १- भोजन ग्रहण करना जूझ बनाई। देसाई के म›ा (खेत) काे छोड़ देने के बाद दादा का धयान किसी काम की तरप़्ाफ नहीं रहा। मन लगाकर वह खेत में श्रम नहीं करता है_ प़् फसल में लागत नहीं लगाता है] लुगाई और बच्चों काे काम में जोतकर किस तरह खुद गाँव भर में खुले साँड़ की तरह घूमता है और अब अपनी मस्ती के लिए किस तरह छोरा के जीवन की बलि चढ़ा रहा है। यह सब उन्हांेने सुनाया। दादा के हरेक तव़फ काे दटा जी राव ने काट दिया और मुझसे कहा] “सवेरे से तू पाठशाला जाता रह] कुछ भी हो] पूरी प़्ाफीस भर दे उस मास्टर की। और मन लगाकर पढ़ाई कर और किसी भी तरह साल नहीं मारा जाए] इसका धयान रख। यदि इसने तुझे पढ़ने नहीं भेजा तो सीधा चला आ इधार। सुबह-शाम जो हो सके] वह काम कर यहाँ और पाठशाला जाते रहना।
Section 6 of 'जूझ' by Anand Yadav. Read the Hindi passage; use Words tab for hard words.
मैं पढ़ाऊँगा तुझे। इसके पास जरा जयादा बच्चे हो गए हैं इसलिए तुम्हारे साथ कुटाों की तरह बता़व करता है।, “मैंने मना कब किया है जी\ इसकाे जरा गलत-सलत आदत पड़ गई थी इसलिए पाठशाला से निकालकर जरा नजरों के सामने रख लिया है।, “वैफसी आदतें\, “चाहे जैसी। यहाँ-वहाँ कुछ भी करता है। कभी कंडे बेचता] कभी चारा बेचता] सिनेमा देखता] कभी खेलने जाता। खेती और घर के काम में इसका बिलकुल धयान नहीं है।, दादा ने मेरे ऊपर अचानक हल्ला बोल दिया। “क्यों रे छोकरे\, “नहीं जी! कभी एक बार मेले में पटा पर पैसे लगा दिए थे। दादा तो कभी भी सिनेमा के लिए पैसे नहीं देते हैं। इसलिए खेत पर गोबर बीन-बीनकर माँ से कंडे थपवा लिए थे और उन्हें बेचकर ही कपड़े भी बनवाए थे। उसी समय एक बार सिनेमा भी गया था।, मैंने भी झूठ-सच मिलाकर ठोंक दिया। “अब यह सब बंद कर और सिप़्ा़फ पढ़ाई में मन लगा। ना पास नहीं हुआ है कभी\, “नहीं जी। पाठशाला जाना ही बंद करा दिया इसलिए परीक्षा में नहीं बैठा हूँ।, “अच्छा-अच्छा।
Section 7 of 'जूझ' by Anand Yadav. Read the Hindi passage; use Words tab for hard words.
अब तू घर जा और सवेरे से पाठशाला जाने लग।, “जी।, मैं उठ खड़ा हुआ। बाहर निकलते-निकलते मैंने सुना] “अरे] बच्चे की जात है। एकाधा वक्त सिनेमा चला गया तो क्या हुआ\ एकाधा बार खेलने में लग गया तो क्या हुआ\ इस बात पर उसका पढ़ना-लिखना बंद कर देना है क्या\, “जी।, आप कहते हैं तो भेज देता हूँ कल से। देखते हैं एकाधा वषा़ में कुछ सुधार हो जाए तो।, दादा ने मन मारकर कहा। इस समय उसका काेई बस नहीं चला था। खाना खाते-खाते दादा ने मुझसे वचन ले लिया। पाठशाला ग्यारह बजे होती है। दिन निकलते ही खेत पर हाजिर होना चाहिए। ग्यारह बजे तक पानी लगाना चाहिए। खेत पर से सीधो पाठशाला पहुँचना। सवेरे आते समय ही पढ़ने का बस्ता घर से ले आना। छु^ी होते ही जूझ घर मंे बस्ता रखकर सीधो खेत पर आकर घंटा भर ढोर चराना और कभी खेतों में जयादा काम हुआ तो पाठशाला में गैर-हाजिरी लगाना- --समझे! मंजूर है का\, “हाँ¿। खेत में काम होगा तो गैरहाजिर रहना ही चाहिए।, मैं ऐसे बोल रहा था मानो मुझे सारी बातें मंजूर हैं। मन आनंद से उमड़ रहा था।
Section 8 of 'जूझ' by Anand Yadav. Read the Hindi passage; use Words tab for hard words.
“हाँ¿] इतना मंजूर हो तो पाठशाला जाना। नहीं तो यह पढ़ना-लिखना किस काम का\, “मैं सवेरे-शाम खेतों पर आता रहूँगा न।, “हाँ] यदि नहीं आया किसी दिन तो देख गाँव में जहाँ मिलेगा वहीं कुचलता हूँ कि नहीं-तुझे। तेरे ऊपर पढ़ने का भूत सवार हुआ है। मुझे मालूम है] बालिस्टर नहीं होनेवाला है तू\, दादा बार-बार कुर-कुर कर रहा था-मैं चुपचाप गरदन नीची करके खाने लगा था। रोते-धाोते पाठशाला फिर से शु: हो गई। गरमी-सरदी] हवा-पानी] वषा़] भूख-प्यास आदि का कुछ भी खयाल न करते हुए खेती के काम की चक्की में] ग्यारह से पाँच बजे तक पिसते रहने से छुटकारा मिल गया। उस चक्की की अपेक्षा मास्टर की छड़ी की मार अच्छी लगती थी। उसे मैं मजे से सहन कर लेता था। दोपहरी-भर की कड़क धाूप का समय पाठशाला की छाया मंे व्यतीत हो रहा था-गरमी के दो महीने आनंद में बीत गए। फिर से पाँचवीं में जाकर बैठने लगा। फिर से नाम लिखवाने की ज:रत नहीं पड़ी। ^पाँचवीं नापास* की टिप्पणी नाम के आगे लिखी हुई थी। वह पाँचवीं के ही हाजिरी रजिस्टर में लिखा रह गया था।
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पहले दिन कक्षा में गया तो गली के दो लड़काें काे छोड़कर काेई भी पहचान का नहीं था। मेरे साथ के सभी लड़के आगे चले गए थे। मेरी अपेक्षा कम उम्र के और मैं जिन्हें कम अकल का समझता था] उन्हीं के साथ अब बैठना पड़ेगा] यह बात कक्षा में पहुँचने पर समझ में आई। मन ख^ा हो गया। बाहरी-अपरिचित जैसा एक बेंच के एक सिरे पर काेने में जा बैठा। मास्टर काैन है] इसका पता नहीं था। पुरानी किताबों और पुरानी कापियों का उस कक्षा से काेई संबंधा नहीं था फिर भी ल_े के बने थैले में उन्हें ले आया था। बस अंे पर काेई लड़का अपनी पोटली सँभाले किसी इंतजार में जैसे बैठा होता है] उसी तरह मैं अपनी पढ़ाई की पुरानी धाराेहर सँभाले बैठा था। “क्या नाम है मेहमान\ नया दिखाई देता है। या गलती से इस कक्षा में आ बैठे हो\, कक्षा के सबसे जयादा शरारती चàाण के लड़के ने सामने आकर खिल्ली उड़ाने के स्वर में पूछा। मेरे धयान में आया कि मेरी पोशाक भी अजनबी जैसी है। बालुगड़ी की लाल माटी के रंग में मटमैली हुई धाोती और गमछा पहनकर मैं अकेला ही था।
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“देखें-देखें तुम्हारा गमछा।, कहते हुए उसने मेरा गमछा२ खींच लिया।…गया अब मेरा गमछा। पूरी कक्षा में इसकी खींचातानी होगी और फट जाएगा। मन में मैं यह सोचकर रफआँसा हो गया। लेकिन वैसा कुछ हुआ नहीं। उस लड़के ने उसे अपने सिर पर लपेट लिया और मास्टर की नकल करते हुए उसे उतारकर टेबल पर रखकर अपने सिर पर हाथ प्ोफरते हुए हुश्श¿¿ की आवाज की। इतने में मास्टर आ गए और वह गुंडा झट से अपनी जगह पर जा बैठा। मेरा गमछा टेबल पर ही रहा। पहले दिन ही इस घटना ने मेरे दिल की धाड़कन बढ़ा दी और छाती में धाक-धाक होने लगी। रणनवरे मास्टर कक्षा में आए। टेबल पर मटमैला गमछा देखकर उन्होंने पूछा] “किसका है रे\, “मेरा है मास्टर।, “तू काैन है\, “मैं जकाते। पिछले साल प़्ोफल होकर इसी कक्षा में बैठा हूँ।, “गमछा ले जा पहले।, उसने छड़ी से मेरा गमछा उठाकर नीचे डाल दिया।
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मैं उसे उठाने गया तो कहा] “यहाँ क्यों रखा है मूखोएं की तरह\, “मैंने नहीं रखा मास्टर] उस लड़के ने मेरे सिर से छीन लिया और यहाँ रख दिया है।, “यह चàाण का बच्चा बिना बात के उठक-पटक करता है।, कहते हुए मास्टर उस लड़के की ओर चले गए। मास्टर ने मेरे बारे में और भी पूछताछ की और वामन पंडित की कविता पढ़ाने लगे। २- पतले कपड़े का तौलिया जूझ बीच की छु^ी में मेरी धाोती की काछ उस लड़के ने दो बार खींचने की काेशिश की। लेकिन मैं फिर दीवार की तरप़्ाफ पीठ करके जा बैठा तो पूरी छु^ी होने से पहले उठा ही नहीं। खिलौने के लिए बनाए गए काैआ के बच्चे काे खुले में रख देने पर जैसे काैए चाराें ओर से उस पर चोंच मारते हैं] वैसा ही मेरा हाल हो गया। मेरी ही पाठशाला मुझे चोंच मार-मारकर घायल कर रही थी। घर जाते समय सोच रहा था कि लड़के मेरी खिल्ली उड़ाते हैं धाोती खींचते हैं गमछा खींचते हैं] तो इस तरह कैसे निबाह होगा…\ नहीं जाऊँगा ऐसी पाठशाला में। इससे तो अपना खेत ही अच्छा है चुपचाप काम करते रहो।
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