CBSE Class 12 · Hindi 1st Language · वितान भाग 2
अतीत में दबे पाँव
Chapter summary, hard words and model exam answers for CBSE Class 12 Hindi.
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Om Thanvi
Summary
अभी भी मुअनजो-दड़ो१ और हड़प्पा२ प्राचीन भारत के ही नहीं] दुनिया के दो सबसे पुराने नियोजित शहर माने जाते हैं। ये सिंधाु घाटी सभ्यता के परवती़ यानी परिपक्व दौर के शहर हैं। खुदाई में और शहर भी मिले हैं। लेकिन मुअनजो-दड़ो ताम्र काल के शहरों में सबसे बड़ा है। वह सबसे उऋव्फष्ट भी है। व्यापक खुदाई यहीं पर संभव हुई। बड़ी तादाद में इमारतंे] सड़वेंफ] धातु-पऋथर की मूति़याँ] चाक पर बने चितिात भांडे] मुहरें] साजो-सामान और खिलौने आदि मिले। सभ्यता का अधयिन संभव हुआ। उधार सैकड़ों मील दूर हड़प्पा के जयादातर सा{य रेललाइन बिछने के दौरान ^विकास की भेंट चढ़ गए।* मुअनजो-दड़ो के बारे में धारणा है कि अपने दौर में वह घाटी की सभ्यता का वेंफद्र रहा होगा। यानी एक तरह की राजधानी। माना जाता है यह शहर दो सौ हैक्टर क्षेता में पैफला था। आबादी काेई पचासी हजार थी। जाहिर है] पाँच हजार साल पहले यह आज के ^महानगर* की परिभाषा काे भी लाँघता होगा।
Section 1 of 'अतीत में दबे पाँव' by Om Thanvi. Read the Hindi passage; use Words tab for hard words.
दिलचस्प बात यह है कि सिंधाु घाटी मैदान की संस्व्फति थी] पर पूरा मुअनजो-दड़ो छोटे-मोटे टीलों पर आबाद था। ये टीले प्राव्फतिक नहीं थे। कच्ची और पक्की दोनों तरह की १- पाकिस्तान के सिंद्प्रांत में स्थित पुराताटिवक स्थान] जहाँ सिंद्ु घाटी सभ्यता बसी थी। मुअनजो-दड़ो का अथ़ है मुदोएं का टीला। वत़मान समय में इसे मोहनजोदड़ो के नाम से जाना जाता है। २- पाकिस्तान के पंजाब प्रांत का पुराताटिवक स्थान] जहाँ सिंद्ु घाटी सभ्यता का दूसरा प्रमुख नगर बसा था अतीत में दबे पाँव ओम थानवी ईंटों से धारती की सतह काे ऊँचा उठाया गया था] ताकि सिंधाु का पानी बाहर पसर आए तो उससे बचा जा सके। मुअनजो-दड़ो की खूबी यह है कि इस आदमि शहर की सड़काें और गलियों में आप आज भी घूम-फिर सकते हैं। यहाँ की सभ्यता और संस्व्फति का सामान भले अजायबघरों की शोभा बढ़ा रहा हो] शहर जहाँ था अब भी वहीं है।
Section 2 of 'अतीत में दबे पाँव' by Om Thanvi. Read the Hindi passage; use Words tab for hard words.
आप इसकी किसी भी दीवार पर पीठ टिका कर सुस्ता क्यों न हो] किसी घर की देहरी पर पाँव रखकर आप सहसा सहम सकते हैं] रसोई की खिड़की पर खड़े होकर उसकी गंधा महसूस कर सकते हैं। या शहर के किसी मुअनजो-दड़ो की एक गली मुअनजो-दड़ो की एक मुख्य सड़क जो ३३ फीट चौड़ी है अतीत में दबे पाँव सुनसान माग़ पर कान देकर उस बैलगाड़ी की रफन-झुन सुन सकते हैं जिसे आपने पुरातटव की तसवीरों में मि ^ी के रंग में देखा है। सच है कि यहाँ किसी आँगन की टूटी-फूटी सीढि़याँ अब आपकाे कहीं नहीं ले जातीं_ वे आकाश की तरप़्ाफ अधाूरी रह जाती हैं। लेकिन उन अधाूरे पायदानों पर खड़े होकर अनुभव किया जा सकता है कि आप दुनिया की छत पर हैं_ वहाँ से आप इतिहास काे नहीं] उसके पार झाँक रहे हैं। सबसे ऊँचे चबूतरे पर बड़ा बौद्ध स्तूप है। मगर यह मुअनजो-दड़ो की सभ्यता के बिखरने के बाद एक जीण़-शीण़ टीले पर बना। काेई पचीस पुफट ऊँचे चबूतरे पर छब्बीस सदी पहले बनी ईंटों के दम पर स्तूप काे आकार दिया गया। चबूतरे पर भिक्षुओं के कमरे भी हैं।
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१९२२ में जब राखालदास बनजी़ यहाँ आए] तब वे इसी स्तूप की खोजबीन करना चाहते थे। इसके गिद़ खुदाई शु: करने के बाद उन्हें इलहाम ३ हुआ कि यहाँ ईसा पूव़ के निशान हैं। भारतीय पुरातटव सवे़क्षण के महानिदेशक जाॉन माश़ल के निदे़श पर खुदाई का व्यापक अभियान शु: हुआ। धाीमे-धाीमे यह खोज विशेषाज्ञों काे सिंधाु घाटी सभ्यता की देहरी पर ले आई। इस खोज ने भारत काे मिस्र और मेसोपोटामिया (इराक) की प्राचीन सभ्यताओं के समकक्ष ला खड़ा किया। दुनिया की प्राचीन सभ्यता होने के भारत के दावे कुो पुरातटव का वैज्ञानिक आधार मिल गया। पय़टक बँगले से एक सपि़ल पगडंडी पार कर हम सबसे पहले इसी स्तूप पर पहँुचे। पहली ही झलक ने हमें अपलक कर दिया। इसे नागर भारत का सबसे पुराना लैंडस्केप कहा गया है। यह शायद सबसे रोमांचक भी है। न आकाश बदला है] न धारती। पर कितनी सभ्यताएँ] इतिहास और कहानियाँ बदल गएं। इस ठहरे हुए द्श्य में हजाराें साल से लेकर पलभर पहले तक की धाड़कन बसी हुई है। इसे देखकर सुना जा सकता है।
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भले ही किसी जगह के बारे में हमने कितना पढ़-सुन रखा हो] तसवीरें या व्टाचिता देखे हों] ३- अनुभूति देखना अपनी आँख से देखना है। बाकी सब आँख का झपकना है। जैसे याता अपने पाँव चलना है] बाकी सब तो कदम-ताल है। मौसम जाड़े का था पर दुपहर की धाूप बहुत कड़ी थी। सारे आलम काे जैसे एक फीके रंग में रंगने की काेशिश करती हुई । यह इलाका राजस्थान से बहुत मिलता-जुलता है। रेत के टीले नहीं हैं। खेतों का हरापन यहाँ है। मगर बाकी वही खुला आकाश] सूना परिवेश_ धाूल] बबूल और जयादा ठंड] जयादा गरमी। मगर यहाँ की धाूप का मिजाज जुदा है। राजस्थान की धाूप पारदशी़ है। सिंधा की धाूप चौंधिायाती है। तसवीर उतारते वक्त आप वैफमरे में ज:री पुजे़ न घुमाएँ तो ऐसा जान पड़ेगा जैसे द्श्यों के रंग उड़े हुए हों। पर इससे एक प़्ाफायदा हुआ। हमें हर द्श्य पर नजरें दुबारा फिरानी पड़ती । इस तरह बार-बार निहारें तो द्श्य जेहन में ऐसे ठहरते हैं मानो तसवीर देखकर उनकी याद ताजा करने की कभी ज:रत न पड़े।
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स्तूप वाला चबूतरा मुअनजो-दड़ो के सबसे खास हिस्से के एक सिरे पर स्थित है। इस हिस्से काे पुरातटव के वि}ान ^गढ़* कहते हैं। चारदीवारी के भीतर ऐतिहासिक शहरों के सटा-वेंफद्र अवस्थित होते थे] चाहे वह राजसटा हो या धाम़सटा। बाकी शहर गढ़ से कुछ दूर बसे होते थे। क्या यह रास्ता भी दुनिया कुो मुअनजो-दड़ो ने दिखाया\ मुअनजो-दड़ो में बौद्ध स्तूप अतीत में दबे पाँव सभी अहम और अब दुनिया-भर में प्रसिद्ध इमारतों के इमारतें] सभा भवन] ज्ञानशाला और काेठार हैं। वह अनुष्ठानिक महावुंफड भी जो सिंधाु घाटी सभ्यता के अि}तीय वास्तुकाैशल काे स्थापित करने के लिए अकेला ही काप़्ाफी माना जाता है। असल में यहाँ यही एक निमा़ण है जो अपने मूल स्व:प के बहुत नजदीक बचा रह सका है। बाकी इमारतें इतनी उजड़ी हुई हैं कि कल्पना और बरामद चीजों के जोड़ से उनके उपयोग का अंदाजा भर लगाया जा सकता है। नगर नियोजन की मुअनजो-दड़ो अनूठी मिसाल है।
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इस कथन का मतलब आप बड़े चबूतरे से नीचे की तरप़्ाफ देखते हुए सहज ^शहर* की सड़काें और गलियों के विस्तार काे स्पष्ट करने के लिए फिर आड़ी। आज वास्तुकार इसे ^ग्रिड प्लान* कहते हैं। आज की सेक्टर-माका़ काॉलोनियों में हमें आड़ा-सीधा ^नियोजन* बहुत मिलता है। लेकिन वह रहन-सहन काे नीरस बनाता है। शहरों में नियोजन के नाम पर भी हमें अराजकता जयादा हाथ लगती है। ब्रासीलिया या चंडीगढ़ और इस्लामाबाद ^ग्रिड* शैली के शहर हैं जो आधाुनिक नगर नियोजन के प्रतिमान ठहराए जाते हैं] लेकिन उनकी बसावट शहर के खुद विकसने का कितना अवकाश छोड़ती है इस पर बहुत शंका प्रकट की जाती है। मुअनजो-दड़ो की साक्षर सभ्यता एक सुसंस्व्फत समाज की स्थापना थी] लेकिन उसमें नगर नियोजन और वास्तुकला की आखिर कितनी भूमिका थी\ स्तूप वाले चबूतरे के पीछे ^गढ़* और ठीक सामने ^उच्च* वग़ की बस्ती है। उसके पीछे पाँच किलोमीटर दूर सिंधाु बहती है। पूरब की इस बस्ती से दक्षिण की तरप़्ाफ नजर दौड़ाते हुए पूरा पीछे देंगे।
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दक्षिण में जो टूटे-फूटे घरों का जमघट है] वह कामगाराें की बस्ती है। कहा जा सकता है इतर वग़ की। संपन्न समाज में वग़ भी होंगे। लेकिन क्या निम्न वग़ यहाँ नहीं था\ कहते हैं] निम्न वग़ के घर इतनी मजबूत सामग्री के नहीं रहे होंगे कि पाँच हजार साल टिक सवेंफ। उनकी बस्तियाँ और दूर रही होंगी। यह भी है कि सौ साल में अब तक इस इलाके के एक-तिहाई हिस्से की खुदाई ही हो पाई है। अब वह भी बंद हो चुकी है। हम पहले स्तूप के टीले से महावुंफड के विहार की दिशा में उतरे। दाईं तरप़्ाफ एक लंबी गली दीखती है। इसके आगे महावुंफड है। पता नहीं सायास है या संयोग कि धाराेहर के प्रबंधाकाें ने उस गली का नाम दैव माग़ (डिविनिटि स्ट्रीट) रखा है। माना जाता है कि उस सभ्यता में सामूहिक स्नान किसी अनुष्ठान का अंग होता था। वुंफड करीब चालीस पाुफट लंबा और पच्चीस पुफट चौड़ा है। गहराई सात पाुफट। वुंफड में उटार और दक्षिण से सीढि़याँ उतरती हैं। इसके तीन तरप़्ाफ साधाुओं के कक्ष बने हुए हैं। उटार में दो पाँत में आठ स्नानघर हैं।
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इनमें किसी का }ार दूसरे के सामने नहीं खुलता। सिद्ध वास्तुकला का यह भी एक नमूना है। मुअनजो-दड़ो का प्रसिद्ध जल वुंफड इस वुंफड में खास बात पक्की एंटों का जमाव है। वुंफड का पानी रिस न सके और बाहर का ^अशुद्ध* पानी वुंफड में न आए] इसके लिए वुंफड के तल में और दीवाराें पर एंटों के बीच चूने और चिरोड़ी के गारे का इस्तेमाल हुआ है। पाश्व़ की दीवाराें के साथ दूसरी दीवार खड़ी की गई है जिसमें सप़्ोफद डामर का प्रयोग है। वुंफड के पानी के बंदोबस्त के लिए एक तरप़् फ कुआँ है। दोहरे घेरे वाला यह अकेला कुआँ है। इसे भी वुंफड के पविता या अनुष्ठानिक होने का प्रमाण माना गया है। वुंफड से पानी काे बाहर बहाने के लिए नालियाँ हैं। इनकी खासियत यह है कि ये भी पéïी एंटों से बनी हैं और एंटों से ढकी भी हैं। अतीत में दबे पाँव पक्की और आकार में सम:प धाूसर एंटें तो सिंधाु घाटी सभ्यता की विशि‘ पहचान मानी ही गई हैं] ढकी हुई नालियों का उल्लेख भी पुराताटिवक वि}ान और इतिहासकार जोर देकर करते हैं।
Section 9 of 'अतीत में दबे पाँव' by Om Thanvi. Read the Hindi passage; use Words tab for hard words.
पानी-निकासी का ऐसा सुव्यवस्थित बंदोबस्त इससे पहले के इतिहास में नहीं मिलता। महावुंफड के बाद हमने ^गढ़* की ^परिक्रमा* की। वुंफड के दूसरी तरप़्ाफ विशाल काेठार है। कर के :प में हासिल अनाज शायद यहाँ जमा किया जाता था। इसके निमा़ण :प खासकर चौकियों और हवादारी काे देखकर ऐसा कयास लगाया गया है। यहाँ नौ-नौ चौकियों की तीन कतारें हैं। उटार में एक गली है जहाँ बैलगाडि़यों का जिनके प्रयोग के सा{य मिले हैं ढुलाई के लिए आवागमन होता होगा। ठीक इसी तरह का काेठार हड़प्पा में भी पाया गया है। अब यह जगजाहिर है कि सिंधाु घाटी के दौर में व्यापार ही नहीं] उन्नत खेती भी होती थी। बरसों यह माना जाता रहा कि सिंधाु जल निकासी का उन्नत प्रबंद्जो सिंद्ु घाटी की अनूठी विशेषाता है घाटी के लोग अÂ उपजाते नहीं थे] उसका आयात करते थे। नयी खोज ने इस खयाल काे निम़ूल साबित किया है। बल्कि अब कुछ वि}ान मानते हैं कि वह मूलतः खेतिहर और पशुपालक सभ्यता ही थी। लोहा शु: में नहीं था पर पऋथर और ताँबे की बहुतायत थी।
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पऋथर सिंधा में ही था] ताँबे की खानें राजस्थान में थीं। इनके उपकरण खेती-बाड़ी में प्रयोग किए जाते थे। जबकि मिÏ और सुमेर में चकमक और लकड़ी के उपकरण इस्तेमाल होते थे। इतिहासकार इरप़्ाफान हबीब के मुताबिक यहाँ के लोग रबी की प़् फसल लेते थे। कपास] गेहूँ] जौ] सरसों और चने की उपज के पुख्ता सबूत खुदाई में मिले हैं। वह सभ्यता का तर-युग था जो धाीमे-धाीमे सूखे में ढल गया। वि}ानों का मानना है कि यहाँ ज्वार] बाजरा और रागी की उपज भी होती थी। लोग खजूर] खरबूजे और अंगूर उगाते थे। झाडि़यों से बेर जमा करते थे। कपास की खेती भी होती थी। कपास काे छोड़कर बाकी सबके बीज मिले हैं और उन्हें परखा गया है। कपास के बीज तो नहीं] पर सूती कपड़ा मिला है। ये दुनिया में सूत के दो सबसे पुराने नमूनों में एक है। दूसरा सूती कपड़ा तीन हजार ईसा पूव़ का है जो जाॉड़न में मिला। मुअनजो-दड़ो में सूत की कताई-बुनाई के साथ रंगाई भी होती थी। रंगाई का एक छोटा कारखाना खुदाई में माधाोस्व:प वऋस काे मिला था।
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छालटी (लिनन) और उफन कहते हैं यहाँ सुमेर से आयात होते थे। शायद सूत उनकाे निया़त होता हो। जैसा कि बाद में सिंधा से मधय एशिया और यूरोप काे सदियों हुआ। प्रसंगवश] मेसोपोटामिया के शिलालेखों में मुअनजो-दड़ो के लिए ^मेलुहा* शब्द का संभावित प्रयोग मिलता है। महावुंफड के उटार-पूव़ में एक बहुत लंबी-सी इमारत के अवशेषा हैं। इसके बीचांेबीच खुला बड़ा दालान है। तीन तरप़्ाफ बरामदे हैं। इनके साथ कभी छोटे-छोटे कमरे रहे होंगे। पुरातटव के जानकार कहते हैं कि धामि़क अनु’ानों में ज्ञानशालाएँ सटी हुई होती थीं] उस नजरिए से इसे ^काॉलेज ऑफ प्रीस्ट्स* माना जा सकता है। दक्षिण में एक और भग्न इमारत है। इसमें बीस खंभों वाला एक बड़ा हाॉल है। अनुमान है कि यह राज्य सचिवालय] सभा-भवन या काेई सामुदायिक वेंफद्र रहा होगा। गढ़ की चारदीवारी लाँघ कर हम बस्तियों की तरप़्ाफ बढ़े। ये ^गढ़* के मुकाबले छोटे टीलों पर बनी हैं] इसलिए इन्हें ^नीचा नगर* कहकर भी पुकारा जाता है।
Section 12 of 'अतीत में दबे पाँव' by Om Thanvi. Read the Hindi passage; use Words tab for hard words.
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