CBSE Class 11 · Hindi 1st Language · वितान भाग 1
भारतीय गायिकाओं में बेजोड़: लता मंगेशकर
Chapter summary, hard words and model exam answers for CBSE Class 11 Hindi.
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Yatindra Mishra
Summary
भारतीय गायिकाओं में बेजोड़ लता मंगेशकर भारतीय गायिकाओं में बेजोड़ लता मंगेशकर कुमार गंद्व़ रसों पहले की बात है। मैं बीमार था। उस बीमारी में एक दिन मैंने सहज ही रेडियो लगाया और अचानक एक अि}तीय स्वर मेरे कानों में पड़ा। स्वर सुनते ही मैंने अनुभव किया कि यह स्वर कुछ विशेषा है] रोज का नहीं। यह स्वर सीधो मेरे कलेजे से जा भिड़ा। मैं तो हैरान हो गया। मुझे समझ में नहीं आ रहा था कि यह स्वर किसका है। मैं तन्मयता से सुनता ही रहा। गाना समाप्त होते ही गायिका का नाम घोषिात किया गया लता मंगेशकर। नाम सुनते ही मैं चकित हो गया। मन-ही-मन एक संगति पाने का भी अनुभव हुआ। सुप्रसिद्ध गायक दीनानाथ मंगेशकर की अजब गायकी एक दूसरा स्व:प लिए उन्हीं की बेटी की काेमल आवाज में सुनने का अनुभव हुआ। मुझे लगता है ^बरसात* के भी पहले के किसी चितापट का वह काेई गाना था। तब से लता निरंतर गाती चली आ रही है और मैं भी उसका गाना सुनता आ रहा हूँ। लता के पहले प्रसिद्ध गायिका नूरजहाँ का चितापट संगीत में अपना जमाना था।
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परंतु उसी क्षेता में बाद में आई हुई लता उससे कहीं आगे निकल गई। कला के क्षेता में ऐसे चमऋकार कभी-कभी दीख पड़ते हैं। जैसे प्रसिद्ध सितारिये विलायत खाँ अपने सितारवादक पिता की तुलना में बहुत ही आगे चले गए। १- स्वरों के व्रफमबद्ध समूह। स्वर मालिका में बोल (शब्द) नहीं होते। मेरा स्पष्ट मत है कि भारतीय गायिकाओं में लता के जोड़ की गायिका हुई ही नहीं। लता के कारण चितापट संगीत काे विलक्षण लोकप्रियता प्राप्त हुई है] यही नहीं लोगों का शास्ताीय संगीत की ओर देखने का द्ष्टिकाेण भी एकदम बदला है। छोटी बात कहूँगा। पहले भी घर-घर छोटे बच्चे गाया करते थे पर उस गाने में और आजकल घरों में सुनाई देने वाले बच्चों के गाने में बड़ा अंतर हो गया है। आजकल के नन्हे- मुन्ने भी स्वर में गुनगुनाते हैं। क्या लता इस जादू का कारण नहीं है\ काेकिला का स्वर निरंतर कानों में पड़ने लगे तो काेई भी सुनने वाला उसका अनुकरण करने का प्रयऋन करेगा। ये स्वाभाविक ही है।
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चितापट संगीत के कारण संुदर स्वर मालिकाएँ१ लोगों के कानों पर पड़ रही हैं। संगीत के विविधा प्रकारों से उनका परिचय हो रहा है। उनका स्वर-ज्ञान बढ़ रहा है। सुरीलापन क्या है] इसकी समझ भी उन्हें होती जा रही है। तरह-तरह की लय के भी प्रकार उन्हें सुनाई पड़ने लगे हैं और आकारयुक्त लय के साथ उनकी जान-पहचान होती जा रही है। साधारण प्रकार के लोगों काे भी उसकी सू{मता समझ में आने लगी है। इन सबका श्रेय लता काे ही है। इस प्रकार उसने नयी पीढ़ी के संगीत काे संस्कारित किया है और सामान्य मनुष्य में संगीत विषायक अभिरफचि पैदा करने में बड़ा हाथ बँटाया है। संगीत की लोकप्रियता] उसका प्रसार और अभिरफचि के विकास का श्रेय लता काे ही देना पडे़गा। भारतीय गायिकाओं में बेजोड़ लता मंगेशकर सामान्य श्रोता काे अगर आज लता की धवनिमुद्रिका१ और शास्ताीय गायकी२ की धवनिमुद्रिका सुनाई जाए तो वह लता की धवनिमुद्रिका ही पसंद करेगा। गाना काैन से राग में गाया गया और ताल काैन-सा था] यह शास्ताीय ब्योरा इस आदमी काे सहसा मालूम नहीं रहता।
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उसे इससे काेई मतलब नहीं कि राग मालकाेस३ था और ताल तिाताल४। उसे तो चाहिए वह मिठास] जो उसे मस्त कर दे] जिसका वह अनुभव कर सके और यह स्वाभाविक ही है। क्योंकि जिस प्रकार मनुष्यता हो तो वह मनुष्य है] वैसे ही ^गानपन*५ हो तो वह संगीत है। और लता का काेई भी गाना लीजिए तो उसमें शत-प्रतिशत यह ^गानपन* मौजूद मिलेगा। लता की लोकप्रियता का मुख्य मम़ यह ^गानपन* ही है। लता के गाने की एक और विशेषाता है] उसके स्वरों की निम़लता। उसके पहले की पाश्व़ गायिका नूरजहाँ भी एक अच्छी गायिका थी] इसमें संदेह नहीं तथापि उसके गाने में एक मादक उटान दीखता था। लता के स्वरों में काेमलता और मुग्धाता है। ऐसा दीखता है कि लता का जीवन की ओर देखने का जो द्ष्टिकाेण है वही उसके गायन की निम़लता में झलक रहा है। हाँ] संगीत दिग्दश़काें ने उसके स्वर की इस निम़लता का जितना उपयोग कर लेना चाहिए था] उतना नहीं किया। मैं स्वयं संगीत दिग्दश़क होता तो लता काे बहुत जटिल काम देता] ऐसा कहे बिना रहा नहीं जाता।
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लता के गाने की एक और विशेषाता है] उसका नादमय उच्चार। उसके गीत के किन्हीं दो शब्दों का अंतर स्वरों के आलाप }ारा बड़ी सुंदर रीति से भरा रहता है और ऐसा प्रतीत होता है कि वे दोनों शब्द विलीन होते-होते एक दूसरे में मिल जाते हैं। यह १- स्वरलिपि २- जिसमें गायन काे कुछ निध़रित नियमों के अंदर ही गाया-बजाया जाता है। खयाल] द्रुपद] धामार आदि शास्ताीय गायकी के अंतग़त आते हैं। ३- भैरवी थाट का राग] जिसमें रे और प व£जत हैं। इसमें सारे स्वर काेमल लगते हैं। यह गंभीर प्रकृति का लोकप्रिय राग है। ४- यह सोलह माताओं का ताल है। इसमें चार-चार माताओं के चार विभाग होते हैं। ५- गाने का ऐसा अंदाज जो एक आम आदमी काे भी भावविभोर कर दे। बात पैदा करना बड़ा कठिन है] परंतु लता के साथ यह बात अऋयंत सहज और स्वाभाविक हो बैठी है। ऐसा माना जाता है कि लता के गाने में करफण रस विशेषा प्रभावशाली रीति से व्यक्त होता है] पर मुझे खुद यह बात नहीं पटती। मेरा अपना मत है कि लता ने करफण रस के साथ उतना न्याय नहीं किया है।
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बजाए इसके] मुग्धा Üा्ंगार की अभिव्यक्ति करने वाले मधय या द्रुतलय१ के गाने लता ने बड़ी उऋकटता से गाए हैं। मेरी द्ष्टि से उसके गायन में एक और कमी है_ तथापि यह कहना कठिन होगा कि इसमें लता का दोषा कितना है और संगीत दिग्दश़काें का दोषा कितना। लता का गाना सामान्यतः उफँची प^ी२ में रहता है। गाने में संगीत दिग्दश़क उसे अधिाकाधिाक ऊँची प^ी में गवाते हैं और उसे अकारण ही चिलवाते हैं। एक प्रश्न उपस्थित किया जाता है कि शास्ताीय संगीत में लता का स्थान काैन-सा है। मेरे मत से यह प्रश्न खुद ही प्रयोजनहीन है। उसका कारण यह है कि शास्ताीय संगीत और चितापट संगीत में तुलना हो ही नहीं सकती। जहाँ गंभीरता शास्ताीय संगीत का स्थायीभाव है वहीं जलदलय३ और चपलता चितापट संगीत का मुख्य गुणधाम़ है। चितापट संगीत का ताल प्राथमिक अवस्था का ताल होता है] जबकि शास्ताीय संगीत में ताल अपने परिष्कृत :प में पाया जाता है। चितापट संगीत में आधो तालों का उपयोग किया जाता है। उसकी लयकारी बिलकुल अलग होती है] आसान होती है।
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यहाँ गीत और आघात काे जयादा महऋव दिया जाता है। सुलभता और लोच४ काे अग्र स्थान दिया जाता है_ तथापि चितापट संगीत गाने वाले काे शास्ताीय संगीत की उटाम जानकारी होना आवश्यक है और वह लता के पास निःसंशय है। तीन-साढे़ तीन मिनट के गाए हुए १- लय तीन प्रकार की होती है प- विलंबितलय (धाीमी) पप- मधयलय (बीच की) पिप- द्रुतलय (तेज) मधयलय से दुगुनी और विलंबितलय से चौगुनी तेज लय द्रुतलय कहलाती है। २- ऊँचे (तारसप्तक के) स्वरों का प्रयोग ३- द्रुत लय (तेज) ४- स्वरों का बारीक मनोरंजक प्रयोग भारतीय गायिकाओं में बेजोड़ लता मंगेशकर चितापट के किसी गाने का और एकाधा खानदानी शास्ताीय गायक की तीन-साढ़े तीन घंटे की महपि़्ाफल] इन दोनों का कलाऋमक और आनंदाऋमक मूल्य एक ही है] ऐसा मैं मानता हूँ। किसी उटाम लेखक का काेई विस्त्त लेख जीवन के रहस्य का विशद् :प में वण़न करता है तो वही रहस्य छोटे से सुभाषिात का या नन्ही-सी कहावत में सुंदरता और परिपूण़ता से प्रकट हुआ भी द्ष्टिगोचर होता है।
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उसी प्रकार तीन घंटांे की रंगदार महपि़्ाफल का सारा रस लता की तीन मिनट की धवनिमुद्रिका में आस्वादित किया जा सकता है। उसका एक-एक गाना एक संपूण़ कलाकृति होता है। स्वर] लय] शब्दाथ़ का वहाँ तिावेणी संगम होता है और महपि़्ाफल की बेहोशी उसमें समाई रहती है। वैसे देखा जाए तो शास्ताीय संगीत क्या और चितापट संगीत क्या] अंत में रसिक काे आनंद देने की सामथ्य़ किस गाने में कितना है] इस पर उसका महऋव ठहराना उचित है। मैं तो कहूँगा कि शास्ताीय संगीत भी रंजक न हो] तो बिलकुल ही नीरस ठहरेगा। अनाकषा़क प्रतीत होगा और उसमें कुछ कमी-सी प्रतीत होगी। गाने में जो गानपन प्राप्त होता है] वह केवल शास्ताीय बैठक के पक्केपन की वजह से ताल सुर के निदो़षा ज्ञान के कारण नहीं। गाने की सारी मिठास] सारी ताकत उसकी रंजकता प्राचीन वा|यंता पर मुख्यतः अवलंबित रहती है और रंजकता का मम़ रसिक वग़ के समक्ष वैफसे प्रस्तुत किया जाए] किस रीति से उसकी बैठक बिठाई जाए और श्रोताओं से वैफसे सुसंवाद साधा जाए] इसमें समाविष्ट है।
Section 8 of 'भारतीय गायिकाओं में बेजोड़: लता मंगेशकर' by Yatindra Mishra. Read the Hindi passage; use Words tab for hard words.
किसी मनुष्य का अस्थिपंजर और एक प्रतिभाशाली कलाकार }ारा उसी मनुष्य का तैलचिता१] इन दोनों में जो अंतर होगा वही गायन के शास्ताीय ज्ञान और उसकी स्वरों }ारा की गई सुसंगत अभिव्यक्ति में होगा। संगीत के क्षेता में लता का स्थान अव्वल दरजे के खानदानी गायक के समान ही मानना पडे़गा। क्या लता तीन घंटों की महपि़्ाफल जमा सकती है] ऐसा संशय व्यक्त करने वालों से मुझे भी एक प्रश्न पूछना है] क्या काेई पहली श्रेणी का गायक तीन मिनट की अवधिा में चितापट का काेई गाना उसकी इतनी कुशलता और रसोऋकटता से गा सकेगा\ नहीं] यही उस प्रश्न का उटार उन्हें देना पडे़गा\ खानदानी गवैयों का ऐसा भी दावा है कि चितापट संगीत के कारण लोगों की अभिरफचि बिगड़ गई है। चितापट संगीत ने लोगों के ^कान बिगाड़ दिए* ऐसा आरोप लगाया जाता है। पर मैं समझता हूँ कि चितापट संगीत ने लोगों के कान खराब नहीं किए हैं] उलटे सुधार दिए हैं। ये विचार पहले ही व्यक्त किए हैं और उनकी पुन:क्ति नहीं क:ँगा।
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सच बात तो यह है कि हमारे शास्ताीय गायक बड़ी आऋमसंतुष्ट व्टिा के हैं। संगीत के क्षेता में उन्होंने अपनी हुकुमशाही स्थापित कर रखी है। शास्ता-शुद्धता के कम़कांड काे उन्होंने आवश्यकता से अधिाक महऋव दे रखा है। मगर चितापट संगीत }ारा लोगों की अभिजाऋय संगीत से जान-पहचान होने लगी है। उनकी चिकिऋसक और चौकस व्टिा अब बढ़ती जा रही है। केवल शास्ता-शुद्ध और नीरस गाना उन्हें नहीं चाहिए] उन्हें तो सुरीला और भावपूण़ गाना चाहिए। और यह क्रांति चितापट संगीत ही लाया है। चितापट संगीत समाज की संगीत विषायक अभि#चि में प्रभावशाली मोड़ लाया है। चितापट संगीत की लचकदारी उसका एक और सामथ्य़ है] ऐसा मुझे लगता है। उस संगीत की मान्यताएँ] मया़दाएँ] झंझटें सब कुछ निराली हैं। चितापट संगीत का १- जिस चिता में तैलीय रंगों का प्रयोग किया जाता है। भारतीय गायिकाओं में बेजोड़ लता मंगेशकर तंता ही अलग है। यहाँ नवनिमि़ति की बहुत गुंजाइश है।
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जैसा शास्ताीय रागदारी का चितापट संगीत दिग्दश़काें ने उपयोग किया] उसी प्रकार राजस्थानी] पंजाबी] बंगाली] प्रदेश के लोकगीतों के भंडार काे भी उन्होंने खूब लूटा है] यह हमारे धयान में रहना चाहिए। धाूप का काैतुक करने वाले पंजाबी लोकगीत] :क्ष और निज़ल राजस्थान में पज़न्य१ की याद दिलाने वाले गीत पहाड़ों की घाटियों] खोरों में प्रतिधवनित होने वाले पहाड़ी गीत] ऋतुचक्र समझाने वाले और खेती के विविधा कामों का हिसाब लेने वाले कृषिागीत और ब्रजभूमि में समाविष्ट सहज मधाुर गीतों का अतिशय मामि़क व रसानुकूल उपयोग चितापट क्षेता के प्रभावी संगीत दिग्दश़काें ने किया है और आगे भी करते रहेंगे। थोडे़ में कहूँ तो संगीत का क्षेता ही विस्तीण़ है। वहाँ अब तक अलक्षित] असंशोधिात और अद्ष्टिपूव़ ऐसा खूब बड़ा प्रांत है तथापि बड़े जोश से इसकी खोज और उपयोग चितापट के लोग करते चले आ रहे हैं। फलस्व:प चितापट संगीत दिनांेदिन अधिाकाधिाक विकसित होता जा रहा है। ऐसे इस चितापट संगीत क्षेता की लता अनभिषिाक्त २ सम्राज्ञी है।
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और भी कई पाश्व़ गायक-गायिकाएँ हैं] पर लता की लोकप्रियता इन सभी से कहीं अधिाक है। उसकी लोकप्रियता के शिखर का स्थान अचल है। बीते अनेक वषाोएं से वह गाती आ रही है और फिर भी उसकी लोकप्रियता अबाधिात है। लगभग आधाी शताब्दी तक जन-मन पर सतत प्रभुऋव रखना आसान नहीं है। जयादा क्या कहूँ] एक राग भी हमेशा टिका नहीं रहता। भारत के काेने-काेने में लता का गाना जा पहुँचे] यही नहीं परदेस में भी उसका गाना सुनकर लोग पागल हो उठें] यह क्या चमऋकार नहीं है\ और यह चमऋकार हम प्रऋयक्ष देख रहे हैं। ऐसा कलाकार शताब्दियों में शायद एक ही पैदा होता है। ऐसा कलाकार आज हम सभी के बीच है] उसे अपनी आँखों के सामने घूमता-फिरता देख पा रहे हैं। कितना बड़ा है हमारा भाग्य! १- बादल] २- बेताज अभ्यास १- लेखक ने पाठ में गानपन का उल्लेख किया है।
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