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CBSE Class 11 · Hindi 1st Language · वितान भाग 1

भारतीय कलाएँ

Chapter summary, hard words and model exam answers for CBSE Class 11 Hindi.

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Shivpujan Sahay

Summary

भारतीय कलाएँ लाओं की अपनी भाषा होती है जैसे- हम अपने आस-पास के परिवेश] çकृति या भावों और विचाराें काे भाषा मे व्यक्त करते हैं। वैसे ही चिताकारी] संगीत या न्ऋय के माधयम से भी हम अपने आस-पास और çकृति काे अभिव्यक्त करते हैं। हम जो कुछ दे•ते-सुनते हैं उसे किसी न किसी :प में और नए-नए तरीके से कहना या अभिव्यक्त करना चाहते हैं। समुæ में उठती गिरती लहरों काे दे•कर चिताकार उसे रंगों से सजाता है। चिडि़याँ की चहचहाहट काे गायक स्वरों में सजाता है तो नत़क मन के भावों काे विभिन्न मुæाओं में सजाता है। कभी भीमबेटका की गुफा के चिता भारतीय कलाएँ चिताों में] तो कभी गीतों में] कभी न्ऋय में] तो कभी संगीत में यह कहने-सुनने की परंपरा सदियों से चल रही है और आज भी नए-नए तरीकाें में लगाता र -जारी है। हमारा देश भारत उऋसवद्मी़ है। विविद्ता हमारी पहचान है। विभिन्न संस्कृतियों और विभिन्न ऋयोहाराें के साथ-साथ विविद्कलाएँ भी हमारी अनूठी पहचान हैं।

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आपने दे•ा होगा कि भारत के अलग-अलग राज्यों की अपनी-अपनी विशिष्ट कलाएँ हैं। आपने यह भी दे•ा होगा कि हमारी कलाओं काे ऋयोहाराें] उऋसवों से •ेती-बाड़ी से भी जुड़ी हैं। मनुष्य के जीवन से जुड़ी होने के कारण ही भारत की ये विशिष्ट कलाएँ विरासत के çति हमें उऋसाह और विश्वास से भर देती हैं। क्या आपकाे यह नहीं लगता कि पवोएं-ऋयोहाराें या फिर फसलों से कलाओं का जुड़ाव ही एक ओर इसे केवल मनोरंजन या अलंकरण होने से बचाता है] तो दूसरी ओर यही पहलू] çाचीन परंपराओं की सतत निरंतरता काे बनाए र•ता है। वास्तव में यही अतीत और वत़मान के बीच जुड़ाव की कड़ी भी है। अगर हम आज पीछे मुड़कर दे•ें तो पाएँगे कि जनजातीय और लोकिला शैलियों के सभी :पों में एक व्यवस्था भी दि•ाई पड़ती है] जो आगे चलकर शास्ताीय कलाओं का आधर बनीं। एक बात धयान देने की है कि शु#आती दौर में सभी कलाओं का संबंद्लोक या समूह से ही था। बाद में चलकर जब इनका संबंद्व्यवसाय से जुड़ा तो व्यक्ति वेंफिæत होती चली गएं।

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मधयकाल तक आते-आते साहिऋय] चिता] संगीत] न्ऋय कलाएँ राजाओं और विभिन्न शासकाें के संरक्षण में चली गईं और द्ीरे-द्ीरे शास्ताीय नियमों में बँद्ीं। वे कलाकारों काे अपनी अभि#चियों के अनु:प कलाओं काे सुव्यवस्थित और परिष्कृत करने के लिए çोऋसाहित भी करते रहते थे। इस तरह मंदिरों और महलों में विकसित होती हुई ये कलाएँ शास्ताीय स्व:प ग्रहण करती गएं। गुप्त साम्राज्य में तो पराकाष्ठा पर पहुँच गएं। भरत मुनि के नाट्यशास्ता में इनका शास्ताीय स्व:प बना] जो कला के लिए अब तक का çाप्त सबसे महऋवपूण़ शास्ता है। भारतीय कलाएँ शास्ता ने संगीत] न्ऋय-अभिनय कलाओं काे एक शास्ताीय कला का स्व:प दिया। फिर भी लोक कलाएँ अपनी जड़ों से पूरी तरह जुड़ी रहीं। आज की कलाओं की जड़ें लोक में ही हैं] चाहे चिताकला हो] संगीतकला हो या फिर न्ऋय कला। शास्ताीय और लोकिलाओं के बीच कभी न •ऋम होने वाला संवाद ही इनकी ताकत है। चिताकला चिताकारी çाचीन काल से ही हमारे जीवन का अभिन्न अंग रहा है।

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जब हमारे पास भाषा नहीं थी तब भी चिताकारी थी और यही अभिव्यक्ति का माधयम थी। çागैतिहासिक समय मे अपने वातावरण] रहन-सहन] भावों और विचाराें काे मनुष्य ने चिताों के माधयम से ही व्यक्त किया। सबसे çाचीन चिताों के नमूने शैल चिताों काे ही माना जाता है। ये चêðानों पर çाकृतिक रंगों से बने हुए चिता हैं। ये गु -फाओं में मिलते हैं। मधय çदेश में भीम बेटका की गु-फाएँ शैल चिताों के लिए जानी जाती हैं। इन चिताों में जीवन की रो -जमरा़ की गतिविद्यिाँ शिकार] न्ऋय] संगीत] जानवर] युद्ध] साज-सज्जा सभी कुछ दि•ाई पड़ता है। गु-फाओं में कला स्जन की अति çाचीन परंपरा रही है। एलोरा और अजंता की गु -फाएँ कला कृतियों के लिए विख्यात हैं। चौथी से छठी सदी के बीच गुप्त साम्राज्य कलाओं के लिए स्वण़ युग कहलाता है। अजंता की गु-फाएँ उन्हीं दिनों •ोदी गयीं। उनकी दीवाराें पर चिता बनाए गए। बाग और बादामी की गु -फाएँ भी एलोरा की गु-फाओं में वैफलाश मंदिर का चिता महाराष्ट्र की वरली शैली में बने चिता इसी ज़्ामाने की हैं।

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अजंता की गु-फाओं के चिता इतने आकषा़क हैं कि वे आज तक के कलाकारों पर गहरा असर डालते हैं। ऐसा मानना है कि अजंता के दीवाराें पर बने चिताों काे बौद्ध भिक्•ुओं ने बनाया है। सातवीं-आठवीं सदी में चêðानोें काे काटकर एलोरा की गु-फाएँ तैयार की गएं। इसकी सबसे बड़ी विशेषाता है कि इन्हीं के बीच वैफलाश का बहुत विशाल मंदिर है। इन मानुषाी कला स्जन काे दे•कर आश्चय़ होता है। उन दिनों मनुष्य ने इसकी कल्पना वैफसे की होगी और फिर उस कल्पना काे साकार करने के लिए कितना परिश्रम किया होगा! लगभग इसी समय निमि़त एलीपैंफटा की गु-फाएँ भी मिलती हंै। यहाँ तिामूति़ की -जबरदस्त मूति़ है। दक्षिण भारत के महाबलिपुरम की विशाल मूति़ कला और तंजौर की चिताकला] कला काैशल के अद्भुत उदाहरण हंै। हम जिसे लघुचिता के नाम से जानते हैं] वे दो çकार के हैं। एक-स्थायी जो कपड़ों] किताबों] लकड़ी या कागज़्ा पर किया जाता है। इनमें आंद्रçदेश और छटाीसगढ़ की कलमकारी] पंजाब की पुफलकारी] महाराष्ट्र की वरली इऋयादि बहुत çसिद्ध रहे हैं।

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इनमें çयोग होने वाली सभी सामग्री çाकृतिक ही होती हैं। इन चिताों की विशेषाता है इनकी विभिन्न çकार की शैलियाँ। वनों-गाँवों के लोग अपनी-अपनी पारंपरिक शैलियों में चिताकारी करते हैं। राजस्थान के चिटाौढ़गढ़ में कलाकार लकड़ी के मंदिरों पर चिताकारी करते थे। इसे किवाड़ पेंटिंग भी किवाड़ चिताकारी] राजस्थान पटचिता] उड़ीसा भारतीय कलाएँ कहते हैं। इस चिताकारी में चिता के माधयम से सांस्कृतिक और ऐतिहासिक कथाओं काे अभिव्यक्त किया जाता है। उड़ीसा के पटचिता कथा में कवि जयदेव के गीतगोविंद काे भी उकेरा गया है। इसे कागज़्ा या पटाों पर गहरे लाल] काले] नीले रंगों से उकेरते हैं। दे•ने की बात है कि गीतगोविंद के पदों काे नत़क ओडि़शी न्ऋय के माधयम से भी अभिव्यक्त करते हैं। सभी कलाएँ एक दूसरे से जुड़ी हुई हंै। मिथिला की चिताकारी में मद्ुबनी चिताकला भी बहुत çसिद्ध है। आज भी कलाकार अपनी इस कला काे ि -जंदा र•े हुए हैं। आज के राष्ट्रीय और अंतरा़ष्ट्रीय बाज़्ार में भी इन लघु लोक कलाओं की बहुत मांग है।

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अस्थायी कलाओं में काेहबर] ऐपण] अल्पना] रंगोली जैसी कलाएँ का-फी çचलित हैं। इन कलाओं का संबंद्शादी-ऋयोहार और उऋसवों से है। इन्हें क्षेताीय भाषाओं में अलग-अलग नाम से जाना जाता है। वास्तव में उटारा•ंड में जिसे ऐपण कहते हैं उसे ही राजस्थान में मंडवा] गुजरात में सटिाया] महाराष्ट्र में रंगोली] बिहार में अरिपन] मधयçदेश और उटारçदेश में चौकपूरना] दक्षिण भारत में काेलम के नाम से जाना जाता है। ये सभी किसी विशेषा मांगलिक अवसरों पर बनाए जाते हैं। कलाओं का यह अद्भुत संसार हमारी संस्कृति की पहचान है] पर हम यह भी जानते हैं कि हिंदुस्तानी कला जितनी हिंदुस्तान में दि•ाई पड़ती है ] इससे कहीं अद्कि उसके बाहर भी है। यह धयान देने की बात है कि यहाँ की कला अन्य देशों में किस çकार विकसित और सुरक्षित है। वास्तव में “हिंदुस्तान के अंदर की ही हिंदुस्तानी कला काे जानना उसकी आद्ी ही कहानी जानने के बराबर है।

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उसे पूरी तौर पर समझने के लिए हमें बौद्ध-द्म़ के साथ-साथ मधय-एशिया] चीन और जापान रंगोली चिताकला तक जाना चाहिए_ तिब्बत और बमा़ और स्याम में पैफलकर नये :प धरण करते हुए और पुफटकर नये सौंदय़ पेश करते हुए हमें इसे दे•ना चाहिए_ हमें कंबोडिया और जावा में इसके शानदार और बेमिसाल कारनामों काे दे•ना चाहिए। ,१ यह सच है कि भारतीय कलाओं का विस्तार विश्व के अन्य भू-भागों में भी हुआ] लेकिन उन कलाकृतियों के स्जन मे क्षेताीय विशेषाताएँ हैं। गांधर शैली में बनी बुद्ध की çतिमा और तिब्बत की शैली में बनी बुद्ध çतिमा में अपनी-अपनी क्षेताीय पहचान स्पष्ट दि•ाई देती है। संगीत कला भारत के çाचीनतम संगीत का वण़न वैदिक काल में मिलता है। वि}ान लगभग पाँच हजार ई-वषा़ पूव़ के समय काे वैदिक काल मानते हैं। इस समय में दो çकार के संगीत का उल्ले• मिलता है। एक-मागी़ तथा दूसरा-देसी। मागी़ संगीत धमि़क समाराेहों से जुड़ा था और नियम और अनुशासन से बँध था। देसी लोक से जुड़ा था। लोक #चि के अनुसार यह समूह में ही गाया जाता था।

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सामवेद मे गाने के जो निद़ेश दिए गए हैं उससे यह पता चलता है कि वैदिक महषिा़यों के पूजा और मंताोच्चार के तरीके काे ही साम कहते थे। हमारे यहाँ आगे चलकर संगीत का जो विकास हुआ इसकी जानकारी बहुत नहीं मिलती। उसका कारण यह भी है कि हम भारतीय दस्तावेजीकरण नहीं राग-मेघ मल्हार] बूंदी चिताकला की राजस्थान शैली ^साहिऋयसंगीतकलाविहीनः] साक्षाऋपशुः पुच्छविषाणहीनः* (साहिऋय संगीत कला से विहीन मनुष्य साक्षात बिना पूँछ के पशु के समान होता है -नीतिशतक] भत़्हरि १रेजिनल्ड ली मे की ^बुद्धिस्ट आट़ इन स्याम* (वैंफब्रिज] १९३८) की प्रस्तावना का अंश जो यू-एन- घोषाल की ^प्रोग्रेस ऑ-फ ग्रेटर इंडियन रीसच़* (कलकटा] १९४३) में उधद्त है। भारतीय कलाएँ करते थे। अन्य कलाओं की तरह संगीत का वण़न भी भरत मुनि के नाट्यशास्ता में ही सबसे çामाणिक ढंग से मिलता है। यह आज के शास्ताीय संगीत से बहुत अलग नहीं था।

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अगर आपने वीणा पर दक्षिण भारतीय संगीतज्ञ काे सुना हो तो अंदाज़्ा लगा सकते हैं कि आज से हज़्ार साल पहले का संगीत वैफसा रहा होगा और यह उसके कितना करीब था। भारतीय संगीत सुर@ताल] राग और काल से संबद्ध है। भिन्न-भिन्न समय के अनुसार राग भी अलग-अलग हैं। जैसे ब्रंमुहुत़ मंे भैरव] मेघ राग का संबंद्सुबह से] दीपक और श्रीराग का संबंद्दोपहर से तो काैशिक और हिंडोला रात मे गाए जाते हैं। अगर आपने भारतीय पारंपरिक वा|यंताों काे धयान से सुना और दे•ा होगा तो आपका धयान इस ओर गया होगा कि भारतीय संगीतज्ञ किसी भी वस्तु से संगीत निकाल सकते हैं। वीणा] जलतरंग] रवाब] दोतार या बांसुरी सुनकर आप इस बात काे समझ सकते हैं। इन सब में çयोग किए जाने वाली ची ज़्ों हमारे आस-पास के रोज़्ामरा़ में çयोग होने वाली हैं। इस अद्भुत विशेषाता के कारण यहाँ की कला सबसे अलग है। यह सहजता और çकृति से जुड़ाव भारतीय कला की विशेषाता रही है। हमारे यहाँ का मुख्य वा| वीणा ही थी।

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क्या आपने कभी सोचा है कि हमारी पुरानी ि-फल्मों में गायक] गायिका नाक से क्यों गाते थे\ आज से दो ह-जार साल पहले भी गायक नाक से गाना पसंद करते थे इसका उल्ले• भरत के नाट्यशास्ता में मिलता है। संभवतः यह मुख्य वा| वीणा के सुरों तक पहुँचने की काेशिश का çभाव था। धयान देने की बात है कि यह उऋसव और उल्लास भरा संगीत भी द्ीरे-द्ीरे नियमों से बँध। इसका भी शास्ता लि•ा गया और बाद में चलकर एक शास्ताीय परंपरा शु: हुई। संगीत भी लोक से जुड़ा था। इसमें संस्कारगीत और ऋतुगीत भी •ूब मिलते हैं। आपने गिरिजा देवी की आवाज़्ा में मिजा़पुर की कज़्ारी ज़्ा:र सुनी होगी। बच्चे स्वागत गीतों से किया जाता है। बंगाल में वषा़मंगल] बसंतोऋसव] ग्रीष्मोऋसव गीतों के बिना कहाँ संभव है। मधयकाल तक आते-आते अन्य कलाओं की तरह संगीत भी व्यावसायिक हुआ] पर भारत का सबसे अच्छा समय वह था जब संगीत मनुष्य के जीवन का ज़्ा:री अंग था। ऐसी कई कहावतें भी मिलती हैं। न्ऋय कला भारतीय संगीत की तरह न्ऋय मे ं भी कम बदलाव आए हैं।

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पहले के नत़क और आज के नत़क भी भारतीय न्ऋयकला के नियमों का पालन करते हैं] जिसका आधर है अभिनय। इसका भी मूलशास्ता भरतमुनि का ^नाट्यशास्ता* ही रहा है। नाट्यशास्ता में ^नऋय़* और ^न्ऋय* दो शब्द मिलते हैं। ये दोनो ं अभिनय के ही अलग-अलग :प हैं। नऋय़-यानी अभिनय। इसमें शब्द और भंगिमा महऋवपूण़ हैं। न्ऋय में भाव और भंगिमा महऋवपूण़ हैं। भारत लोक न्ऋयों से सम्द्ध रहा है। हर राज्य के अलग-अलग समुदायों की अपनी न्ऋयकलाएँ रही हैं] जो हमारे रोज़्ामरा़ के जीवन से जुड़ी हुई हैं। जीवन मे जितने अनुष्ठान हैं उन सबसे न्ऋय कलाओं का भी संबंद्है। •ेती से जुडे़ समुदाय के जीवन में ऋतुओं का बदलना] -फसलों की बुवाई या कटाई सभी महऋवपूण़ घटनाएँ हैं। ऋतुओंें का बदलना उनके पाँवों काे चंचल कर देता है। वषा़ होती है तो उनके पाँव थिरक उठते हैं। भारत के हर राज्य में यही भाव मिलते हैं।

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