CBSE Class 11 · Hindi 1st Language · वितान भाग 1
आलो-आँधारि
Chapter summary, hard words and model exam answers for CBSE Class 11 Hindi.
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Mahadevi Verma
Summary
आलो-आँधारि आलो-आँधारि * - बेबी हालदार अब अपने किराये के घर में थी। सब समय सोचती रहती कि काम न मिला तो बच्चों काे क्या खिलाऊँगी] वैफसे उन्हें पालूँगी-पोसूँगी! मैं स्वयं एक घर से दूसरे घर काम खोजने जाती और दूसरों से भी काम जुटाने के लिए कहती। मुझे यह चिंता भी थी कि महीना खऋम होने पर घर का किराया देना होगा। पता नहीं इससे कम किराये में काेई घर मिलेगा या नहीं! काम के साथ मैं घर भी ढूँढ़ रही थी। डेढ़ सप्ताह हुए जा रहे थे और काम कहीं मिल नहीं रहा था। मुझे बच्चों के साथ उस घर में अकेले रहते देख आस-पास के सभी लोग पूछते] तुम यहाँ अकेली रहती हो\ तुम्हारा स्वामी कहाँ रहता है\ तुम कितने दिनों से यहाँ हो\ तुम्हारा स्वामी वहाँ क्या करता है\ तुम क्या यहाँ अकेली रह सकाेगी\ तुम्हारा स्वामी क्यों नहीं आता\ ऐसी बातें सुन मेरी किसी के पास खड़े होने की इच्छा नहीं होती] किसी से बात करने की इच्छा नहीं होती। बच्चों काे साथ ले मैं उसी समय काम खोजने निकल पड़ती।
Section 1 of 'आलो-आँधारि' by Mahadevi Verma. Read the Hindi passage; use Words tab for hard words.
कुछ घंटों बाद जब मैं घर लौटती तब फिर पड़ोस की औरतें आकर पूछतीं] क्यों] काम मिला\ फिर मेरे चेहरे का भाव देख काेई-काेई मुँह से चुक-चुक आवाज निकाल कहती] मिल जाएगा। इधार-उधार ढूँढ़ने-ढाँढ़ने से मिल ही जाएगा। मैं उनकी बातें अनसुनी कर अपने बच्चों की बातें करने लगती। मैं * अँधोरे का उजाला मेम साहब की काेठी के सामने की एक काेठी में सुनील नाम का तीस-बटाीस साल का एक युवक मोटर चलाता था। वह मुझे पहचानता था इसलिए मैंने उससे भी अपने काम के बारे में कह रखा था। एक दिन रास्ते में मुझे देखकर उसने पूछा] तुम क्या अब उस काेठी में काम नहीं करतीं\ मैंने कहा] मुझे उस काेठी काे छोड़े डेढ़ सप्ताह हो गए। अभी तक मुझे काेई काम नहीं मिला है। वह बोला] ठीक है] मुझे काम के बारे में कुछ पता चलेगा तो बताऊँगा। दो-एक दिन बाद दोपहर काे बच्चों काे खिला-पिलाकर मैं उनके साथ सो रही थी कि सुनील आया और बोला] क्यों] काम मिला\ मैंने कहा] नहीं] अभी तक कुछ नहीं मिला। वह बोला] तो चलो मेरे साथ।
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मैंने पूछा] कहाँ\ तो वह बोला] काम करना है तो मैं तुम्हें लिए चलता हूँ] बाकी बातें तुम स्वयं वहाँ कर लेना। उसकी बात सुन मैं प़्ाफौरन उसके साथ निकल पड़ी। वहाँ पहुँचकर सुनील ने गेट के बाहर लगी बेल बजाई तो उस घर के साहब बाहर आए। सुनील ने उनसे कहा] सर] आपने कहा था न\ मैं इसे ले आया हूँ। उन्होंने मुझसे पूछा] तुम बंगाली हो\ मैं बोली] हाँ। इसके बाद काम के बारे में बातें हुएं उन्होंने कहा] देखो] यहाँ जो औरत काम करती है उसे मैं आठ सौ #पये देता हूँ। तुम्हारे पैसों के बारे में मैं तुम्हारा काम देखकर बताऊँगा। मैं बोली] ठीक है। यहाँ कितने बजे आने से ठीक होगा\ उन्होंने कहा] तुम जितनी जल्दी आ सकाे क्योंकि मैं बहुत सबेरे उठता हूँ। मैं बोली] मुझे तो जाकर बच्चों के लिए खाना-वाना बनाना होगा। मैं छह-सात बजे तक आऊँगी। इतना कहकर मैं चलने लगी तो मुझे लगा वह पैसों के बारे में कुछ कहना चाहते हैं। सुनील जाने काे हुआ तो उससे मैंने थोड़ा #क जाने काे कहा। वह बोला] तुम बात करके आ जाना] मैं चलता हूँ।
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मैंने कहा] बस थोड़ा सा #क जाओ। लेकिन साहब ने फिर पैसों की बात नहीं उठाई और सिप़्ा़फ इतना कहा] कल से तुम काम पर आ जाओ। अगले दिन मैं काम पर आई तो दूर से ही पैंतीस-चालीस वषा़ की एक विधावा काे उसी घर में काम के लिए जाते देखा। साहब बाहर पेड़ों में पानी दे रहे थे। मुझे देखते ही वह भीतर गए और उस औरत से साप़्ाफ-साप़्ाफ बातें कर उसी समय उसे काम से हटा दिया। वह औरत भी बंगाली थी। बाहर आते ही उसने मुझे गालियाँ आलो-आँधारि देना शु: कर दिया। मैंने कहा] देखो] मैं कुछ नहीं जानती। यदि जानती होती कि यहाँ पहले से ही काेई काम कर रहा है तो मैं नहीं आती। मुझसे कहने से काेई लाभ नहीं। तुम साहब काे मेरी तरप़्ाफ से जाकर बता दो कि वह इस तरह काम करने काे राजी नहीं है। उसने ऐसा कुछ नहीं किया और मुझे बकते-बकते चली गई। साहब आकर मुझे भीतर ले गए और सब समझा-बुझा दिया कि क्या करना होगा क्या नहीं करना होगा। बस उस दिन से मैं अपने मन से खाना-वाना बनाकर] टेबिल पर रखकर घर जाने लगी। मेरा काम देखकर घर में सभी आश्चय़ करते।
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एक दिन साहब ने पूछा] तुम इतना ढेर सारा काम इतने कम समय में और इतनी अच्छी तरह वैफसे कर लेती हो\ कहाँ सीखा तुमने यह सब\ मैंने कहा] घर के काम में मुझे असुविधा नहीं होती क्योंकि बचपन से अभ्यास है। बचपन से ही मैं बिना मा१ के रही हूँ। मेरे बाबा भी सब समय घर पर नहीं होते थे। इसी कारण मेरा पढ़ना- लिखना भी नहीं हो सका। मैं इसी तरह रोज सबेरे आती और दोपहर तक सारा काम खऋम कर चली जाती। बीच-बीच में साहब मेरे बारे में इधार-उधार की बातें पूछ लेते। एक दिन उन्होंने मेरे बच्चों की पढ़ाई-लिखाई के बारे में पूछा तो मैंने कहा] मैं तो पढ़ाना चाहती हूँ लेकिन वैसा सुयोग कहाँ है] फिर भी चेष्टा तो क:ँगी ही बच्चों के लिए। उन्होंने एक दिन बुलाकर फिर कहा] तुम अपने लड़के और लड़की काे लेकर आना। यहाँ एक छोटा-सा स्कूल है। मैं वहाँ बोल दूँगा। तुम रोज बच्चों काे वहाँ छोड़ देना और घर जाते समय अपने साथ ले जाना। मैं अब बच्चों काे साथ लेकर आने लगी। उन्हें स्कूल में छोड़] घर आकर अपने काम में लग जाती।
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स्कूल से बच्चे जब मेरे पास आते तो साहब कुछ न कुछ उन्हें खाने काे देते। अब मैं सोचने लगी कि मुझे कहीं और भी काम करना चाहिए क्योंकि इतने पैसों में क्या बच्चों काे पालूँगी-पोसूँगी और क्या घर का किराया दूँगी! मैंने साहब से कहा कि यदि उन्हें पता चले कि किसी काे काम करने वाले की ज:रत है तो १- माँ मुझे बताएँ। उन्होंने कहा कि आस-पास पता कर वह मुझे बताएँगे लेकिन मुझे अब कहीं काम ढूँढ़ने नहीं जाना है। फिर भी मुझे अपना यह घर तो छोड़ना ही होगा] यह सोचकर मैं अपने दादा१ लोगों के आस-पास ही घर ढूँढ़ने गई। घर मिल भी गया और उसी दिन पुराना घर छोड़ मैं उसमें चली आई। इस घर का भाड़ा तो पाँच सौ #पये ही था लेकिन ट ^ी-पेशाब के लिए बाहर जाना होता था। मैंने सोचा जब सब इसी तरह रह रहे हैं तो मैं क्यों नहीं रह सवँूफगी! वहाँ भी लोग मेरे बारे में सब कुछ जानने की चेष्टा करते और मुझे लेकर तरह-तरह की बातें करते। काेई मुझसे अच्छा व्यवहार करता तो काेई नहीं।
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काेई मुझे अच्छी सलाह देता तो काेई मुझे देख दबी जबान से कुछ कहने लगता। इन सब बातों से मुझे कुछ लेना-देना नहीं था। मैं सबेरे उठकर बच्चों काे खिला-पिलाकर रेडी करती और घर में ताला लगाकर उनके साथ निकल पड़ती। मैं एक ही काेठी में काम करते वैफसे अपना काम चलाऊँगी और वैफसे घर का किराया दूँगी] इस बात काे लेकर लोग आपस में खूब बातें करते। मैं स्वयं भी चिंतित थी कि मुझे और दो-एक काेठियों में काम नहीं मिला तो इतने पैसों में गुजारा वैफसे होगा। मैं रोज साहब से पूछती कि किसी ने उन्हें काम के बारे में कुछ बताया क्या। वह मेरा प्रश्न और काेई बात कर टाल देते लेकिन उन्हें देखकर मुझे लगता जैसे वह नहीं चाहते कि मैं कहीं और भी काम क:ँ। शायद वह सोचते रहे हों कि मुझसे वह सब होगा नहीं और होगा भी तो उससे बच्चों की पढ़ाई-लिखाई ठीक से नहीं चल पाएगी। शायद इसीलिए उन्होंने एक दिन हठात्मुझसे पूछा] बेबी] महीने में तुम्हारा कितना खचा़ हो जाता है\ शरम से मैं कुछ नहीं बोली और उन्होंने भी दुबारा नहीं पूछा।
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मुझे सबेरे जल्दी उठकर] बिना कुछ खाए-पिए] काम पर आना पड़ता था। खाना-वाना बनाकर मैं घर जाती और वही सब काम वहाँ जाकर करती। साहब कहते तो कुछ नहीं लेकिन कभी-कभी ऐसा कुछ कर बैठते जिससे मैं जान जाती कि उनके मन में मेरे लिए माया है। सबेरे उनके यहाँ जाने पर कभी देखती कि १- बड़ा भाई आलो-आँधारि वह बत़न पोंछ रहे हैं तो कभी उन्हें झाड़ू लेकर जाले ढूँढ़ते देखती। मैं पूछती कि उन्हें यह सब करने की क्या दरकार१ है तो वह इधार-उधार का काेई बहाना बनाकर बात काे टाल देते। उनके यहाँ काम करने में मुझे बहुत सुख मिलता। वहाँ काेई भी मेरे काम काे लेकर कुछ नहीं कहता। काेई यह तक नहीं देखता कि मैं कुछ कर भी रही हूँ या नहीं। मुझे सबेरे देखते ही साहब का चेहरा खिल उठता लेकिन वह बोलते कुछ भी नहीं। वह जिस तरह से मुझे देखते उससे मुझे लगता जैसे सोच रहे हों कि इस बेचारी काे किस अपराधा के पीछे अपना घर-परिवार छोड़ बच्चों के साथ यहाँ अकेले रहने काे बाधय होना पड़ा!
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उन्हें तब तक जितना मैं जान सकी थी उससे मुझे लगता कि कहीं मुझे दुख न पहुँचे] इस डर से वह मुझसे इस तरह की काेई बात नहीं करते थे। वह कुछ कहना शु: करते फिर अचानक चुप हो जाते। कुछ दिनों बाद एक दिन हठात्उन्होंने पूछा] अच्छा] बेबी यह तो बताओ कि यहाँ से जाकर तुम क्या करती हो\ मैंने कहा] मैं जाते ही खाना बनाने में लग जाती हूँ और साथ ही साथ बच्चों काे नहलाती-धाुलाती हूँ। फिर उन्हें खिला-पिलाकर सुला देती हूँ। तीसरे पहर उनके साथ थोड़ा घूमती-घामती हूँ और शाम काे संधया-पूजाकर उन्हें पढ़ने बिठा देती हूँ। रात में फिर उन्हें खिलाना-पिलाना और सुलाना और सबेरे जल्दी से जल्दी यहाँ के लिए निकल पड़ना। बस यही है मेरे सारे दिन का काम। वह बोले] अच्छा] फिर जो तुम और काम ढूँढ़ रही हो तो उसके लिए तुम्हें समय कहाँ से मिलेगा\ मैं बोली] इसी में से निकालना होगा] और नहीं तो क्या! बिना किए और काेई चारा भी तो नहीं!
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इस पर उन्होंने कहा] देखो] यदि मैं तुम्हारी कुछ मदद कर दूँ तब तो तुम कहीं और काम नहीं करोगी न\ उनकी बात सुन मैं सोचने लगी वह मेरा कितना खयाल रखते हैं] कितना मुझे चाहते हैं! उन्होंने फिर पूछा] क्यों क्या हुआ\ तुमने कुछ बताया नहीं! क्या सोच रही हो\ मैं बस] कुछ भी तो नहीं] १- ज:रत कहकर चुप हो गई। उन्होंने कहा] देखो बेबी] तुम समझो कि मैं तुम्हारा बाप] भाई] मा] बंधाु] सब कुछ हूँ। यह कभी मत सोचना कि यहाँ तुम्हारा काेई नहीं है। तुम अपनी सारी बातें मुझे साप़्ाफ-साप़् फ बता सकती हो] मुझे बिलकुल भी बुरा नहीं लगेगा। थोड़ा #किर उन्होंने फिर कहा] देखो] मेरे बच्चे मुझे तातुश कहते हैं] तुम भी मुझे वही कहकर बुला सकती हो। उस दिन से मैं उन्हें तातुश कहने लगी। मैं तातुश कहकर उन्हें बुलाती तो वह बहुत खुश होते और कहते] तुम मेरी लड़की जैसी हो। इस घर की लड़की हो। कभी यह मत सोचना कि तुम परायी हो। वहाँ काेई भी मेरे साथ पराये जैसा व्यवहार नहीं करता। तातुश के तीन लड़के थे।
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उस समय तक मैंने एक ही काे देखा था और वह उनका सबसे छोटा लड़का था। उसके मुँह में जैसे जबान ही नहीं थी। मैं किचेन में ही काम कर रही होती तब भी चाय बनाने के लिए मुझसे न कह वह स्वयं अपनी चाय बना लेता। उसकी आदत ही थी कम बोलने की। मुझसे तो क्या] वह किसी से भी जयादा बात नहीं करता था। तातुश ने एक दिन बताया कि उनका बड़ा लड़का आ रहा है। उन्होंने कहा] मेरा बड़ा लड़का] माने तुम्हारा बड़ा भाई। तातुश की इस तरह की बातें सुन मुझे बहुत अच्छा लगता। मैं सोचती कि सचमुच ही वह मुझे बहुत चाहते हैं। दो-एक दिन बाद मैं सबेरे काम कर रही थी तो तातुश ने बुलाकर कहा] बेबी] तुमने क्या घर बदल लिया है\ मैंने हाँ कहा तो वह बोले] तुमने घर बदला और मुझे बताया तक नहीं! मुझे चुप देख उन्होंने कहा] यह तुमने ठीक नहीं किया] बेबी। मैंने सोचा] सचमुच ही मुझसे भूल हुई] एक बार बताना तो चाहिए ही था। मेरे न बताने से उन्हें दुख हुआ] यह तो मालूम पड़ गया लेकिन यह समझ में नहीं आया कि उन्हें पता वैफसे चला।
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स्वयं उन्होंने यह कहकर बात साप़्ाफ कर दी कि सुनील ने उन्हें बताया था। मैं अभी सोच ही रही थी कि सुनील काे कहाँ से पता चला होगा कि तातुश ने फिर कहा] सुनील तुमसे मिलने तुम्हारे पुराने घर गया था। वहाँ तुम्हें न देख उसने आस-पास के लोगों से पूछा तो पता चला कि तुम कहीं और चली गई हो। तातुश ने आगे बताया कि सबेरे वह दूधा लेने गए थे तो वहाँ सुनील मिला था। उन्हें देखकर सुनील ने पूछा था] बेबी क्या अब आपके यहाँ काम नहीं करती\ तातुश आलो-आँधारि के पूछने पर कि वह ऐसा क्यों सोच रहा है] सुनील ने कहा था] बेबी अब वहाँ नहीं रहती जहाँ पहले रहती थी इसलिए मैंने सोचा कि वह शायद अब आपके पास नहीं है। तातुश मुझसे बोले] सुनील नहीं बताता तो मुझे कुछ पता ही नहीं चलता! मुझे सुनकर बहुत बुरा लगा। मैंने सोचा] सचमुच मुझसे अन्याय हुआ। वह थोड़ी देर मेरे चेहरे की ओर देखते रहे] फिर पूछा] अभी जब मैंने तुम्हें बुलाया तो तुम क्या कर रही थीं\ मैं बोली] ऊपर डसि्ंटग कर रही थी। वह बोले] तो जाओ अपना काम करो।
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Model exam answers, grammar & audio
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