मुख्य बात: कवि भारत की सुंदरता की तारीफ़ करते हैं। हिमालय उसके माथे जैसा है और सागर उसके पैर धोता है। नदियाँ उसकी छाती पर हीरों के हार जैसी लगती हैं। यहाँ के बाग, वर्षा के बादल और खेती धरती को स्वर्ग जैसा सुंदर बना देते हैं। कवि कहते हैं कि मेरा सारा प्यार भारत में समा गया है।
मूल भाव: कवि श्रीधर पाठक भारत की सुंदरता का गान करते हैं। हिमालय उसका माथा है, सागर उसके चरण धोता है, नदियाँ उसकी छाती पर हीरों के हार जैसी चमकती हैं और आकाश उस पर मणियों से जड़ी नीली चादर-सा फैला है। यहाँ के उपवन, वर्षा के घने बादल और खेती की सुंदर परंपरा धरती पर स्वर्ग की छटा उतार लाते हैं। अंत में कवि अपनी सारी ममता भारत में समा जाने की बात कहकर उसे वंदनीय और अभिनंदनीय मानता है।
ముఖ్య బాత్: కవి భారత్ కీ సుందరతా కీ తారీఫ్ కరతే హైం. హిమాలయ్ ఉసకే మాథే జైసా హై ఔర్ సాగర్ ఉసకే పైర్ ధోతా హై. నదియాం ఉసకీ ఛాతీ పర్ హీరోం కే హార్ జైసీ లగతీ హైం. యహాం కే బాగ్, వర్షా కే బాదల్ ఔర్ ఖేతీ ధరతీ కో స్వర్గ్ జైసా సుందర్ బనా దేతే హైం. కవి కహతే హైం కి మేరా సారా ప్యార్ భారత్ మేం సమా గయా హై.
Central idea: the poet Shridhar Pathak sings the beauty of India. The Himalaya is her forehead, the sea washes her feet, rivers shine like necklaces of diamonds on her chest, and the sky is spread over her like a blue sheet studded with gems. Her gardens, the dense monsoon clouds and the lovely tradition of farming bring a glimpse of heaven to earth. In the end the poet says all his love has merged into India, and he calls her worthy of worship and praise.